इस कहानी को उत्तराखंड की कहें महोबा की कहें, महिंद्रा की कहें , चार नौजवानों के जुनून की कहें या फिर एक सोच की कहें..

इस कहानी को उत्तराखंड की कहें महोबा की कहें, महिंद्रा की कहें , चार नौजवानों के जुनून की कहें  या फिर एक सोच की कहें । या फिर कहते हैं सब कुछ जिसमें सभी बातें  शामिल हो, आइये शुरू करते हैं उत्तराखंड के युवक राहुल पुंडीर की कहानी जो इस थार प्रेम के नायक हैं, एक व्यवसायी परिवार से आने बाले पंडेर को जब शौक का जुनून चढ़ा तो उन्हें अपने लायक एक कार लगी Thaar जिसे खरीदने का मन बनाया इस युवक ने अपने घर वालों से चर्चा की अपने हसीन ख़्याब के बारे में बताया, मनाया समझाया और घर से अपने सपनों की कार खरीदने की अनुमति प्राप्त कर ली, सपनो में थार को शामिल करने के बाद हुई थार की बुकिंग 15 दिसम्बर 2021 को, जरूरत थी थार Top Model किसी भी हालत बस जल्द जल्द , इस कहानी में एक विलेन बना इस कार के रंग की चाहत , क्योकि सब कुछ लगभग पहले से तय हो चुका था, जिसमें बदलाब की कोई गुंजाइश शुरुआत से ही नही थी, अब अपने मुताबिक कार , मॉडल, रंग की खोज की गई पैसा कोई मायने नही रखता था शौक के सामने ।

लेकिन कहते हैं ख़्याब उसी के पूरे होते हैं जिसके सपनो में उड़ान होती है, वैसे तो हरेक परिंदे के पंखों में जान होती है । महिंद्रा कम्पनी अपने ही शहर में मिल गयी, हमें पहुँचे अपनी मोहब्बत पाने लेकिन वो न मिली , गाड़ी की लंबी बुकिंग थी, हमसे पहले उसके आशिक और भी थे, हमसे ज्यादा तेज नशा उन्हें  था इसलिये हमें खाली हाँथ लौटना पड़ा, न मिली पसंद अपनी, शुरू हुई सर्च अपने शहर के आसपास जो शहर से जिले, जिले से राज्य , राज्य से देश तक पहुँची , 1000 फोन , सारे सम्पर्क सब आजमाए गये लेकिन कार जो थी थार मिलने से रही,  हर किसी से बात, मिलकर आ कर जाकर लेकिन कहीं कुछ नहीं सुबह शुरू होती दौड़ कई बार कई दिनों तक चलती लेकिन सफलता हाँथ न लगती, यहाँ एक जिक्र और जरूरी बताया राहुल ने की इस जुनून में उनके साथ उनके तीन बचपन के दोस्त भी शामिल थे और रहे और हैं जिन्होंने राहुल की इस शौक की खातिर हर पल मदद की लेकिन कामयाबी न मिली जिसके नाम एडवोकेट यशवीर सिंह, सूरज चौधरी, अनिकेत सिंह जिन्होंने अपने यार के शौक को पूरा करने में शुरू से अंत तक कर्ण, अर्जुन, भीम, कृष्ण के रूप में साथ दिया ।

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आखिर ऐसा क्या था जो नहीं मिल रहा , ये कार ही क्यों आखिर इसके जबाब अभी मिलना मुश्किल थे लेकिन कहानी  बढ़ी देहरादून से रुड़की और भी बहुत जगह अब आती है बात विलेन की जिसका मुख्य किरदार था इस फ़िल्म में वो था कार का काला रंग कहीं बुकिंग लंबी थी , कहीं टॉप मॉडल नहीं था, लेकिन काला रंग तो बिल्कुल भी खाली नही था. जो हर हाल में चाहिये था ।किसी फिल्म का मशहूर डायलॉग है जब किसी चीज को शिद्दत से चाहो ,तो  पूरी कायनात उसको आपसे मिलाने की कोशिश में लग जाती है  हुआ भी आखिर यही , सब कोशिशों के बावजूद नाकामयाबी के सारे जतन के बाद जब हार नहीं मानी, तो अपने ही शहर में अपने ही करीब एक दोस्त मिले सागर चौधरी , कहते हैं न चौधराहट कभी झुकने नहीं देती, देहरादून उत्तराखंड में Sunrise होटल के मालिक जिनकी शख्शियत को उनके होटल का नाम कह रहा था, Sunrise (उगता हुआ सूरज) कहते हैं हर रात की सुबह होती है और इस रात की सुबह हुई जिसके सहनायक बने  सागर चौधरी उन्होंने बात पूरी सुनी समझी और जुनून को मंजिल तक पहुंचाने की जिम्मेदारी ली जो मोहब्बत दिसम्बर से जून तक  अधूरी थी उसके पूरे होने का समय आ गया चौधरी जी द्वारा महिंद्रा कंपनी के Owner group में बात की, राहुल की जरुरत बताई और उन्हें अपने मित्र मिले महोबा उत्तरप्रदेश के शहर के नजदीक छतरपुर मध्यप्रदेश में आकाश अग्रवाल जिनके महिंद्रा के तीन शोरुम बुंदेलखंड में नटराज के नाम से हैं उन्होंने कार की पूरी जरूरत समझी रंग समझा और मई में शुरू बात के माध्यम से 15 से 20 दिन के अंदर महोबा से महिंद्रा थार ब्लैक कलर की देना स्वीकार किया कम्पनी की प्रक्रिया चली कार महोबा में महिंद्रा एजेंसी में उपलब्ध हो गयी जिसके मैनेजर ……… पटेरिया ने कार की डिलीवरी की स्वीकृति दी ।

अब कार प्रेम कहानी का climex आया , चारो युवा यशवीर, सूरज, राहुल, अनिकेत ट्रेन रुट के माध्यम से महोबा पहुँचे, 1 रोज महोबा में मनमुताबिक होटल न मिलने से परेशान हुये खाने पीने को तरसे, आया 22 जून 2022 का दिन बिना खाये , बिना सोए किसी एक सस्ते से होटल में रात की जद्दोजहद के बाद 10 बजे महोबा परमानंद पर स्थित होटल आर आर सी पहुँचे , जहाँ पिछली रात कमरा नहीं मिला था, होटल में पहुंचते ही कमरा मिलता है , मनमुताबिक़ सुविधा मिलती हैं, नहा धोकर तैयार होकर दो दिन भूखे रहने के बाद खाना खाकर 12 बजे महिंद्रा शोरूम पहुंचते हैं जहाँ से 3 बजे कार पाकर देहरादून को रवाना होते हैं ।

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