माधौगढ़-इन दिनों जब कई पूर्व विधायक अपने वजूद को बचाये रखने के लिए संघर्ष करते दिख रहे हैं,तो वहीं पूर्व मंत्री बृजेंद्र प्रताप सिंह सीमित लेकिन प्रत्येक गांव में राजनीतिक रैली कर अपनी नई राजनीतिक पार्टी को मजबूत करने में जुटे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह के नाम पर बनाई पार्टी विश्वनाथ प्रताप जनता दल का 20 सितंबर को सम्मेलन कर उसमें सदस्यता अभियान को बढाकर अपनी धमक दिखाएंगे। पार्टी का अस्तित्व ब्रजेन्द्र सिंह के आभामंडल और वीपी सिंह की विचारधारा पर टिका हुआ है। गांव गांव में हो रही रैली में बृजेंद्र सिंह का सम्मोहन अभी भी साफ दिख रहा है कि भीड़ उन्हें सुनने के लिए तैयार रहती है लेकिन असल वोट के मैदान में क्या करिश्मा होगा? अभी कहना जल्दबाजी होगी हालांकि राजनीति के चतुर खिलाड़ी बृजेंद्र सिंह का एक हुनर है कि वह हारी बाजी को अपने पक्ष में करने का करिश्मा कर लेते हैं। यही कारण है कि कई प्रभावशाली नेता चुक गए हैं या उनकी पकड़ कमजोर हो गई है। जबकि बृजेंद्र सिंह चुनावी समर में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने से नहीं चूकते,खासकर ब्लॉक प्रमुखी के चुनाव में तो उनका ही दबदबा कायम रहता है। इसलिए अब नए राजनीतिक दल के गठन के बाद उनकी पार्टी किस तरह की सफलता प्राप्त करेगी ? यह आगे आने वाले चुनाव तय करेंगे। फिलहाल उन्होंने अपनी मजबूत टीम के साथ क्षेत्र में ‘जिसकी जितनी भागीदारी,उसकी उतनी हिस्सेदारी’ का नारा देकर नया राजनीतिक विकल्प जरूर दे दिया है।
*वीपी सिंह के नाम पर ही पार्टी क्यों*
वीपी सिंह के नाम पर ब्रजेन्द्र सिंह ने अपना राजनैतिक दल क्यों बनाया? जबकि वीपी सिंह की शख्सियत को भारत के जनमानस ने स्वीकार नहीं किया। उसका कारण था कि राजा मांडा को जो भा गया,उसे पूरा करने की धुन उनके मन में होती थी और उसे पूरा करके मानते थे। ऐसा ही कुछ अंदाज़ ब्रजेन्द्र सिंह का है कि नफा-नुकसान की परवाह किये बिना अपने मन का करते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने मंडल कमीशन( सरकारी नौकरी में पिछड़ा वर्ग को 27 प्रतिशत का आरक्षण) को लागू कर सवर्णों की नाराज़गी मोल ली लेकिन उन्होंने बर्षों से लटके इस मामले को पूरा कर दिया। पूर्व राजीव गांधी के कैबिनेट में होने के बाद भी बोफ़ोर्स और पनडुब्बी घोटाले का मुद्दा उठाना,बाद में कांग्रेस सरकार के ख़िलाफ़ भृष्टाचार का मुद्दा बनाकर स्वयं भाजपा के सहयोग से प्रधानमंत्री बने और लालकृष्ण आडवाणी की बिहार में रथ यात्रा को रोककर प्रधानमंत्री की कुर्सी से हाथ धोना पड़ा लेकिन रहे अपनी धुन के। ऐसे ही अकल्पनीय और संघर्षपूर्ण निर्णय ब्रजेन्द्र सिंह ने अपने राजनैतिक जीवन में किये। जोकि पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह की शैली से प्रभावित दिखते हैं। वैसे भी ब्रजेन्द्र सिंह ने वीपी सिंह और राजबब्बर के साथ मिलकर बनाई गई पार्टी में खूब मेहनत की थी। जिसके चलते वीपी सिंह की छाप उनकी पार्टी की ऊर्जा है।