उत्तर प्रदेश विधान परिषद के विधायकों के जरिये चुनाव में सत्तारूढ भारतीय जनता पार्टी का आत्म विश्वास हिला हुआ नजर आया। 12 सीटों के इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी द्वारा 11 उम्मीदवार उतारे जाने की आशा की जा रही थी पर पार्टी को मतदान की सम्भावना से दुबक जाना पडा । भाजपा ने 11 वे उम्मीदवार के लिये अतिरिक्त मत जुटाने का साहस करने की बजाय 10 उम्मीदवार ही उतारे जबकि समाजवादी पार्टी जो कि अपने मतों के आधार पर एक सीट ही जीत पाने की स्थिति में थी दो उम्मीदवार खडे करने के दाव में कामयाब रही ।
उत्तर प्रदेश में सीएम योगी आदित्यनाथ की हनक का वैसे तो नगाडा बज रहा है। उन्होने अपने दोनो उप मुख्यमंत्रियों का कद बहुत बौना कर दिया है जो शुरू में अपने को उनका समकक्ष समझ रहे थे। खास तौर से केशव प्रसाद मौर्य जिन्होने शुरू में बहुत हेकडी दिखाई थी , एनेक्सी में मुख्यमंत्री के कक्ष पर कब्जा कर लिया था उनका ग्राफ भी आज बहुत नीचे चला गया है। योगी आदित्यनाथ के आगे अब उनकी कोई बिसात नहीं समझी जा रही है। प्रदेश मंहामंत्री संगठन सुनील बंसल शुरूआत में सत्ता के समानान्तर केन्द्र बन गये थे, डीएम और एसपी की नियुक्तियों की लिस्ट वही तैयार करते थे जिस पर योगी आदित्यनाथ को अपनी मुहर लगा देनी पडती थी आज वे भी गुमनामी की धुन्ध में समा गये है क्योंकि प्रदेश सरकार के क्रियाकलाप में उनके हस्तक्षेप की गुजाइश भी योगी ने खत्म कर दी है। वे ऊपरी तौर पर उत्तर प्रदेश के एकछत्र नेता के रूप में अपने को स्थापित कर चुके है। यहां तक कि हिन्दू हृदय सम्राट के रूप में बन चुकी उनकी राष्ट्रव्यापी छवि के कारण पार्टी उत्तर से दक्षिण तक कहीं भी चुनाव हो उनकी सभाओं की जरूरत महसूस करने लगी है।
लेकिन योगी का यह एक पहलू है। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में योगी ने जो राजनीतिक शून्य निर्मित कर दिया है उसकी परिणितियां भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व को सांसत में डाल रही है। आज उत्तर प्रदेश मंे भाजपा के पास ऐसे नेताओं का अभाव है जो धर्म संकट वाले किसी चुनाव को मैनेज कर सके । राज्य सभा के चुनाव में भी यह स्थिति देखने में आयी थी जब भाजपा को अन्दरखाने बसपा से डील करनी पडी थी ताकि मतदान की नौबत से बच सके । यही इतिहास उसे सपा के साथ दोहराना पडा ।
सपा के पास विधान परिषद की 12 सीटों में एक ही उम्मीदवार जिताने लायक संख्या थी । फिर भी उसने अहमद हसन और राजेन्द्र चैधरी दो का नामांकन करा दिया । सपा ने खबर यह फैला दी कि दो उम्मीदवार जिताने के लिये उसने अपने अतिरिक्त मतों के साथ साथ भाजपा के असंतुष्ट विधायकों के मतों की व्यवस्था कर रखी है। इस खबर से भाजपा हाई कमान को पसीने छूट गये । आशंका यह थी कि अगर समाजवादी पार्टी ने सचमुच भाजपा विधायक दल में तोड फोड कर ली और भाजपा के 11वें उम्मीदवार को हरा दिया तो सत्यानाश हो जायेगा। इसका प्रभाव 2022के विधान सभा चुनाव के संदर्भ में पार्टी की हवा पर पड सकता है।
भाजपा हाई कमान को यह विश्वास नहीं था कि योगी सपा के पैतरे की काट में सक्षम हो सकते है। ऐसे में हाई कमान ने हस्तक्षेप कर उत्तर प्रदेश में पार्टी की केवल 10 उम्मीदवार खडे होने दिये जिससे चुनावी शक्ति प्रदर्शन टल सके। सपा इस उठा पटक में काफी फायदे में रही है। उच्च सदन मेें उसका संख्या बल अभी भी सबसे ज्यादा है। जिसकी बदोलत अभी तक सपा के रमेशचन्द्र यादव उच्च सदन के सभापति थे। लेकिन अब उनका कार्यकाल समाप्त हो चुका है। उनके बाद भी समाजवादी पार्टी उच्च सदन में अपना कब्जा बरकरार रखना चाहती है। अहमद हसन उच्च सदन मंे सबसे सीनियर सदस्य होगें इसलिये उन पर दाव खेल कर इसके लिये सपा को अपने नैतिक दावे को मजबूत करने का अवसर भी मिल सकता है। सभी उम्मीदवारों के निर्विरोध निर्वाचन से सपा के इस मंसूबे को और ताकत मिल गयी है। कहा जाता है कि भाजपा ने अपनी नाक बचाने के लिये सपा से अन्दरखाने जो डील की है उसमें भी इसकी शर्त शामिल है।
योगी की प्रशासनिक और राजनीतिक जोडतोड में कमजोरी भाजपा हाईकमान की निगाह में इस कदर है कि उसने चुनावी वर्ष में उनके मेन्टोर के तौर पर आईएएस अधिकारी अरविन्द शर्मा को लखनऊ में लांन्च कर दिया । अरविन्द शर्मा वैसे तो उत्तर प्रदेश के ही मऊ जिले के रहने वाले है लेकिन वे आईएएस में गुजरात केडर में चुने गये थे जहां उन्होने 20 साल तक नरेन्द्र मोदी के साथ काम किया । प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी उन्हें दिल्ली ले आये । भारत सरकार में अभी उनकी सेवाये बाकी थी लेकिन मोदी की इच्छा के कारण ही उन्होने समय से पहले वीआरएस ले लिया । उन्हें स्काईलैब की तरह उत्तर प्रदेश में विधान परिषद चुनाव में उतार दिया गया ताकि यहां की बेलगाम नौकरशाही को वे नियंत्रित करके राजनीति माहौल के अनुरूप ढाल सके ।
लेकिन हाईकमान का अपने प्रदेश में सत्ता का दूसरा केन्द्र बनाने का यह प्रयास योगी को रास नहीं आया । यह खबर सुर्खियों में छा गयी कि विधान परिषद के लिये नामांकन के पहले उनके द्वारा तीन बार समय मांगने के बाबजूद योगी ने उन्हें समय नहीं दिया । हालांकि बाद मे इसका स्पष्टीकरण यह दिया गया कि मुख्यमंत्री गोरखपुर में व्यस्त थे जिसकी वजह से ऐसा हुआ लेकिन इस बीच मुख्यमंत्री ने अपने आवास पर खिचडी भोज आयोजित किया जिसमंे कई पत्रकार भी बुलाये गये। पत्रकारांे ने ही यह सवाल किया कि जब योगी को खिचडी भोज आयोजित कर चुहले करने की फुरसत थी तो अरविन्द शर्मा को समय क्यों नहीं दे सकते थे। सवाल बाजिव है । ध्यान रहे कि अरविन्द शर्मा को केन्द्रीय दूत के रूप में आने की वजह से प्रदेश के अन्य सभी बडे नेताओं ने खासी तरजीह दी । उनसे मुलाकात की , बुके भेंट कर उनका अभिनन्दन किया वगैरह -वगैरह ।
चर्चा तो यहा तक है कि अरविन्द शर्मा को भाजपा हाई कमान की मंशा योगी आदित्यनाथ की कैबिनेट में उप मुख्यमंत्री पद दिलाने की है जो योगी कैसे हजम करेगें यह चर्चा का विषय बन गया है। योगी को केन्द्रीय नेतृत्व यह हस्तक्षेप रास आये या न आये पर उनसे खार खाये पार्टी के नेताओ की उत्तर प्रदेश में कमी नहीं है जो उनकी बौखलाहट का अन्दर ही अन्दर रस ले रहे है।





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