मैग्जीन पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह।
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पर्यावरणविद व जलपुरुष के नाम से प्रसिद्ध मैग्सेसे पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह, उत्तराखंड में रविवार को आए जलप्रलय पर बेहद खतरनाक हैं। उनकी चिंता जीवनदायिनी नदियों को सीमित में बांधने पर भी है। वह उत्तराखंड के चमोली जिले में आई तबाही की असली वजह अलकनंदा नदी पर डैम बनाने को मानते हैं। कहते हैं कि अगर सरकारें अब भी नहीं चेती तो भविष्य में महाजलप्रलय झेलना पड़ेगा। तबीही का मंजर ऐसा होगा जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की होगी। मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के पांच दीक्षांत समारोह में बतौर मुख्य अतिथि शरीक होने आए राजेंद्र सिंह ने सोमवार को अमर उजाला संवाददाता से हिमालय से लेकर गंगा के मैदानी क्षेत्रों तक की नदियों में बढ़ते प्रदूषण और उसके परिणामों के बारे में बातचीत की है। प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश …
प्रश्न: उत्तराखंड में नदियों के संरक्षण के लिए आपने फैला संघर्ष किया है, चमोली जिले में जो तबाही हुई है उसकी वजह क्या है?
उत्तर: अलकनंदा, मंदाकिनी व भागीरथी नदियों को आजाद रखने की जरूरत है। तीनों नदियां देवप्रयाग में मिलती हैं। इन वनस्पतियों का रस मिला है। जब बांध बनाकर पानी रोकेंगे तो वह सिल्ट के साथ नीचे की सतह में बैठ जाएगा। जल की शक्ति खत्म हो जाएगी। ऐसे में जलप्रलय सामने होगा।

प्रश्न: तीर्थाटन के स्थल पर्यटन स्थल बनने लगे हैं, इसे किस रूप में देखते हैं?
उत्तर: विनाश का एक मुख्य कारक यह भी है। देखिए, आज हम पर्यटन के भूखे हैं। ऐसे में तीर्थटन को भूल गए। जबकि, तीर्थटन से आस्था जुड़ी हुई है। संवेदना होती है, जिसके कारण हम उस जगह को संरक्षित रखने के बारे में सोचते हैं। पर्यटन सिर्फ मौज-मस्ती तक सीमित है। इस अंतर को समझने की जरूरत है।

प्रश्न: प्रकृति से छेड़छाड़ बढ़ती जा रही है, यह उसी का परिणाम है तो नहीं?
उत्तर: यह सिर्फ प्रकृति का गुस्सा बताने से काम नहीं चलेगा। यह एंग्री मानव निर्मित है। विकास के दौर में सुरक्षा को भूल जाना पर इस तरह की घटनाएं होंगी। अलकनंदा, मंदाकिनी व भागीरथी नदियां संकट प्रभावित क्षेत्र में हैं। कोई भी बड़ा निर्माण नहीं कर सकता। बड़ा निर्माण करेंगे तो खामियाजा भुगतना होगा। बिहार में पुरुलिया के पास एक झील की दीवार कमजोर हो रही है। उसके फटने से भी तबाही हो सकती है।
प्रश्न: प्रकृति को समझने में भूल कहां हो रही है, आपका दृष्टिकोण में तबाही रोकने के उपाय क्या हैं?
उत्तर: सनातन के बलबूते हम विश्व गुरु थे। सनातन अर्थात सदैव, नित्य, नूतन, निर्माण। यह भारत की वैज्ञानिक समानता है, लेकिन आज हम इकोनॉमी लीडर बनने की होड़ में लगे हुए हैं। विकास की शुरूआत आज विस्थापन से होती है। हम जल और थल के संतुलन को भूल गए हैं। प्रकृति लगातार संकेत दे रही है, उत्तराखंड में जलप्रलय एक सीख है।

प्रश्न: हिमालय की नदियों पर आपने लंबे समय तक काम किया है, क्या विशेषताएं हैं?
उत्तर: अलकनंदा एक मात्र नदी है जो कि गंगा की मुख्य धारा है। दो नदियों के मिलने को प्रयाग इसलिए कहते हैं, क्योंकि दो नदियों के मिलने से नदी की जो पहले गुणवत्ता थी, उसमें वृद्धि होती है। पहले जब अलकनंदा, भागीरथी व मंदाकिनी अपनी आजादी से बहती थीं, तो गंगा में ऐसे तत्व थे, जो कि मानव शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते थे। अब बांध बनाकर अवरोध पैदा कर दिया गया तो ये तत्व सिल्ट के साथ नीचे बैठ जाते हैं। जिसका लाभ मानव जाति को नहीं मिल रहा है।

प्रश्न: बांध बनाने के विरोध में लंबा आंदोलन आपने किया है, कितना मामला आया?
उत्तर: 20 साल से नदियों पर बांध बनाने का विरोध कर रहा हूं। 2009 में तीन बांध लोहारी नागपाला, भैरवघाट और पारामनेली बांध आधा बन चुके थे। आंदोलन करने के बाद इसे बनने से रोकने में सफलता मिली। हालांकि आठ बाँध फिर भी बना दिए गए। उत्तराखंड में हुए प्रलय के बाद सरकार को नए सिरे से सोचने की जरूरत है।
प्रश्न: इस प्रलय के बाद सरकार को क्या सुझाव देना होगा?
उत्तर: भारत को अपनी आस्था व अपने विज्ञान को समझनेकर अलकनंदा को बांधना ही नहीं चाहिए। अलकनंदा, भागीरथी और मंदाकिनी तीनों नदियों को आजाद बहने कृपया। कोई डैम, बैराज न बनाइए। विकास के लिए बिजली वगैरह जरूरी है, तो उसके लिए ऐसी तमाम नदियां हैं, जिन्हें अवरोधों के साथ जीना पसंद है।) जरूरत के हिसाब से वहाँ डैम बनाइए। भविष्य को सुरक्षित करने के लिए इन तीन नदियों को बांधने से आजाद रखना होगा।

प्रश्न: देश भर में नदियां सूख चुकी हैं, प्रदूषण रोकने के उपाय से खुद को कितना संतुष्ट पाते हैं?
उत्तर: हमें रिचार्ज और डिस्चार्ज का संतुलन बनाना होगा। नदियों के सूखने की वजह भूमिगत जल का ज्यादा दोहन है। देश में दो चरण नदियां सूख गई हैं और एक तीन नाला बन गए हैं। गोरखपुर की आमी नदी को नाला में तडिल कर दिया गया। बड़े आंदोलन के बाद आमी को फिर से नदी की मान्यता मिली। यह बड़ी समस्या है। जिम्मेदार सुधार करने की जगह अस्तित्व को मिटाने में लगे हैं। आज भारत की नदियों पर संकट है। इतना ही कहूंगा कि सरकार के प्रयास से संतुष्ट नहीं हूं।

पर्यावरणविद व जलपुरुष के नाम से प्रसिद्ध मैग्सेसे पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह, उत्तराखंड में रविवार को आए जलप्रलय पर बेहद खतरनाक हैं। उनकी चिंता जीवनदायिनी नदियों को सीमित में बांधने पर भी है। वह उत्तराखंड के चमोली जिले में आई तबाही की असली वजह अलकनंदा नदी पर डैम बनाने को मानते हैं। कहते हैं कि अगर सरकारें अब भी नहीं चेती तो भविष्य में महाजलप्रलय झेलना पड़ेगा। तबीही का मंजर ऐसा होगा जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की होगी। मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के पांच दीक्षांत समारोह में बतौर मुख्य अतिथि शरीक होने आए राजेंद्र सिंह ने सोमवार को अमर उजाला संवाददाता से हिमालय से लेकर गंगा के मैदानी क्षेत्रों तक की नदियों में बढ़ते प्रदूषण और उसके परिणामों के बारे में बातचीत की है। प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश …





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