म्यांमार में हुई सैन्य तख्ता पलट के बाद ये आम राय बन रही है कि इस बार लोकतंत्र वापसी की लड़ाई ज्यादा मुश्किल होगी। इसकी एक प्रमुख वजह आंतरिक स्थितियां हैं, जबकि दूसरा बड़ा कारण नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी की नेता आंग सान सू की की अब पहले जैसी छवि का ना रह जाना है।

1990 के दशक में जब चुनावों में भारी जीत के बाद सेना ने सू की को सत्ता सौंपने के बजाय उन्हें जेल में डाल दिया था, तब म्यांमार जबरदस्त आंतरिक दबाव में आ गया। उसके बावजूद सैन्य शासक लगभग दो दशक के बाद निर्वाचित सरकार को सत्ता सौंपने के लिए मजबूर हुए। इस पूरे दौर में दुनिया भर में अति की लोकतंत्र और मानव अधिकारों के लिए संघर्ष की प्रतीक बनी हुई है।

रविवार रात हुए तख्ता पलट के बाद इस बार भी पश्चिमी देशों की प्रतिक्रिया तीखी रही है लेकिन चीन ने काफी नरम रुख अपनाया है। जबकि पिछले एक दशक में चीन, म्यांमार के सबसे बड़े सहायक देश के रूप में उभरा है। इसलिए निशाने की राय है कि सैन्य शासक चीन की मदद की बदौलत पश्चिमी व्यवहार को नजरअंदाज करने की आज की बेहतर स्थिति में।]

सोमवार को अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने म्यांमार पर फिर से प्रतिबंध लगाने की चेतावनी दी। साथ ही उन्होंने म्यांमार के सैन्य जनरलों के खिलाफ आंतरिक एकजुटता की अपील की। ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देशों के अलावा संयुक्त राष्ट्र ने भी सैन्य जनरलों से तुरंत निर्वाचित अधिकारियों को सत्ता सौंपने की मांग की है। लेकिन चीन ने कहा कि उसने म्यांमार की घटनाओं पर गौर किया है। उन्होंने कहा कि वहाँ के सभी पक्ष संविधान और कानूनी ढांचे के तहत अपने मतभेद हल कर सकते हैं, जिससे देश में राजनीतिक और सामाजिक स्थिरता कायम रह सके। इसे किसी भी रूप में कड़ी प्रतिक्रिया नहीं कहा जा सकता है।

चिंता ने ध्यान दिलाया है कि चीन को म्यांमार की राजनीतिक और सामाजिक स्थिरता से अधिक चिंता वहाँ अपने निवेश की है। चीन की बेल्ट और रोड इनिशियन में म्यांमार एक महत्वपूर्ण मुकाम है। वह नए शासकों के साथ संबंध बिगाड़ कर अपनी योजना के लिए मुश्किलें खड़ी नहीं करना चाहता है।

इसी तरह ने यह भी ध्यान दिलाया है कि चीन ने आंग सान सू की के साथ गहरे रिश्ते बना लिए थे। रोहिंग्या मुसलमानों के प्रति उनके रुख को लेकर जब पश्चिमी देशों में सर्वोच्च की कड़ी आलोचना हुई थी, तब चीन ने उनका साथ दिया था। इसलिए अनुमान लगाया गया है कि चीन को म्यांमार में सत्ता परिवर्तन पसंद नहीं आया होगा।

इसके बावजूद उसने नई परिस्थिति के साथ प्रतिबद्धता करना अपने बेहतर समझा है। म्यांमार के आस-पास के अन्य देशों की प्रतिक्रिया भी नए शासकों को राहत देने वाली हो रही है। , थाईलैंड और कंबोडिया ने तख्ता पलट को म्यांमार का गहराई मामला बताकर अपना पल्ला झाड़ लिया है।

सू की की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी 2015 में पहली बार सत्ता में आई थी, लेकिन कामकाज के लिहाज से उसका पहला औसत रहा। देश में जिन राजनीतिक और आर्थिक सुधारों की उम्मीद उससे जोड़ी गई थी, उस पर एनएलडी की सरकार ने उड़ी नहीं। इसकी एक वजह सत्ता पर सेना का शिकंजा कायम रहना भी रही है। जिस संविधान के तहत चुनाव हुए थे, उसमें संसद और महत्वाकांक्षी संस्थाओं पर सेना की पकड़ कायम रखने के प्रावधान हैं, लेकिन एनएलडी की छवि सबसे ज्यादा रोहिंग्या मुसलमानों के मुद्दे पर खराब हुई।

आरोप है कि म्यांमार के रखाइन प्रांत में सेना ने रोहिंग्या मुसलमानों की बड़े पैमाने पर हत्या, गांवों में आगजनी, महिलाओं से सामूहिक बलात्कार जैसे जुल्म ढाए थे। इससे हजारों की संख्या में रोहिंग्या शरणार्थी बनकर बांग्लादेश जाने को मजबूर हुए। तब दुनिया को उम्मीद थी कि आपकी छवि के मुताबिक इन घटनाओं को निंदा करेंगी और उन्हें रोकने की कोशिश करेंगी। लेकिन उनके बयानों से ऐसा लगा कि वे इन घटनाओं का बचाव कर रहे हैं।

ये मामला आंतरिक न्यायालय में भी गया था। वहाँ ची ची ने कहा- ‘रखाइन प्रांत की स्थिति जटिल है, जिसे आसानी से नहीं समझा जा सकता है। वहाँ नरसंहार के आरोप की स्थिति की गुमराह करने वाली तस्वीर पेश करते हैं। ‘ ऐसे बयानों ने उनकी छवि को बहुत नुकसान पहुंचाया है। इसलिए बोलने का कहना है कि पिछली बार एक ऐसी शख्सियत मौजूद थी, जिसके इर्द-गिर्द सैन्य शासन के खिलाफ संघर्ष संगठित हुआ था। जिन्हें आंतरिक समुदाय ने एकमत से समर्थन दिया था। अब उनके पक्ष में वैसा समर्थन बनना मुश्किल है।





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