सार

अमेरिका में रिपब्लिकन दल के चार सदस्यों ने राष्ट्रपति जो बाइडन से को विभाजित -19 वैक्सीन के व्यापार को पेटेंट की पाबंदी से मुक्त रखने जाने के विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में भारत और दक्षिण अफ्रीका के प्रस्ताव को न मानने की अपील की है। इनका मानना ​​है कि कोविड टीकों के व्यापार को डब्ल्यूटीओ की बौद्धिक संपदा आधिकार व्यवस्था (ट्रिप्स) की शर्तों से मुक्त करने पर कंपनियां नए टीएसी और प्रतिरक्षण बढ़ाने वाली दवाओं के अनुसंधान पर खर्च करने बंद कर देंगी।

अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन
– फोटो: twitter.com/JoeBiden

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इन सांसदों में माइक ली, टॉम कॉटन, जोनी एमस्ट और टॉड यंग के नाम शामिल हैं। में इस संबंध में बाइडन को एक पत्र लिखा है। इनका कहना है कि भारत, दक्षिण अफ्रीका और अन्य देश को विभाजित -19 संबंधित सभी नई परियोजनाओं को पेटेंट व्यवस्था से मुक्त रखने का प्रस्ताव डब्ल्यूटीओ में ला रहे हैं। ऐसा प्रस्ताव लाने वालों का कहना है कि यदि हम अमेरिकी कंपनियों द्वारा विकसित बौद्धिक संपदा नष्ट कर दें तो टीएसी के विनिर्माण में जल्द ही कई कंपनियों योगदान देने लगेगी।

लेकिन इन सांसदों का तर्क है कि वास्तविकता इससे उलट है। हर उस अमेरिकी कंपनी के, जो को विभाजित -19 की वैक्सीन और दवाइयों के विकास के काम में लगी है, बौद्धिक संपदा अधिकार को स्पष्ट करके हम ‘ऑपरेशन वार्प स्पीड’ के तहत शुरू की गई वह प्रक्रिया ही खत्म कर देंगे जिससे इतने कम समय में ये टीकर का विकास करना संभव हुआ है। ‘ उन्होंने पत्र में लिखा है कि कुछ देशों की सोच है कि अमेरिका की बौद्धिक संपदा छीन कर वे लाभ में रहेंगे, पर यह उनकी भूल है।

बता दें कि बौद्धिक संपदा अधिकार के व्यापार संबंधी पहलुओं (ट्रिप्स) की डब्ल्यूटीओ व्यवस्था में सरकारों के लिए दवाओं, उनकी जांच और उत्पादन की प्रौद्योगिकी का विकास करने वाली इकाइयां को बाजार में लम्बे समय तक एकतरफा देने के प्रावधान हैं। उल्लेखनीय है कि इससे पहले अमेरिका के सैकड़ों गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) और तीन प्रमुख सांसदों ने राष्ट्रपति जो बाइडन से को विभाजित -19 की वैक्सीन पर पेटेंट की छूट के प्रस्ताव को रोक नहीं की अपील की थी।

सांसद और प्रतिनिधि सभा में विनियोग समिति की सभापति डीलाउरो ने कहा था कि को विभाजित -19 महामारी के लिए किसी देश की सीमा के कोई मायने नहीं हैं। वैक्सीन तैयार करना और दूसरी दुनिया में उसे पहुंचाना बहुत जरूरी है। भारत और दक्षिण अफ्रीका ने डब्ल्यूटीओ में ट्रिप्स की छूट का जो मुद्दा उठाया है उससे कोरोनावायरस महामारी के खिलाफ जंग में दुनिया को मदद मिलेगी। ऐसे छूट से बचने वाले देशों में भी विभाजित -19 की जांच, उपचार और टीकाकरण सुलभ होगा।

विस्तार

इन सांसदों में माइक ली, टॉम कॉटन, जोनी एमस्ट और टॉड यंग के नाम शामिल हैं। में इस संबंध में बाइडन को एक पत्र लिखा है। इनका कहना है कि भारत, दक्षिण अफ्रीका और अन्य देश को विभाजित -19 संबंधित सभी नई परियोजनाओं को पेटेंट व्यवस्था से मुक्त रखने का प्रस्ताव डब्ल्यूटीओ में ला रहे हैं। ऐसा प्रस्ताव लाने वालों का कहना है कि यदि हम अमेरिकी कंपनियों द्वारा विकसित बौद्धिक संपदा नष्ट कर दें तो टीएसी के विनिर्माण में जल्द ही कई कंपनियों योगदान देने लगेगी।

लेकिन इन सांसदों का तर्क है कि वास्तविकता इससे उलट है। हर उस अमेरिकी कंपनी के, जो को विभाजित -19 की वैक्सीन और दवाइयों के विकास के काम में लगी है, बौद्धिक संपदा अधिकार को स्पष्ट करके हम ‘ऑपरेशन वार्प स्पीड’ के तहत शुरू की गई वह प्रक्रिया ही खत्म कर देंगे जिससे इतने कम समय में ये टीकर का विकास करना संभव हुआ है। ‘ उन्होंने पत्र में लिखा है कि कुछ देशों की सोच है कि अमेरिका की बौद्धिक संपदा छीन कर वे लाभ में रहेंगे, पर यह उनकी भूल है।

बता दें कि बौद्धिक संपदा अधिकार के व्यापार संबंधी पहलुओं (ट्रिप्स) की डब्ल्यूटीओ व्यवस्था में सरकारों के लिए दवाओं, उनकी जांच और उत्पादन की प्रौद्योगिकी का विकास करने वाली इकाइयां को बाजार में लम्बे समय तक एकतरफा देने के प्रावधान हैं। उल्लेखनीय है कि इससे पहले अमेरिका के सैकड़ों गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) और तीन प्रमुख सांसदों ने राष्ट्रपति जो बाइडन से को विभाजित -19 की वैक्सीन पर पेटेंट की छूट के प्रस्ताव को रोक नहीं की अपील की थी।

सांसद और प्रतिनिधि सभा में विनियोग समिति की सभापति डीलाउरो ने कहा था कि को विभाजित -19 महामारी के लिए किसी देश की सीमा के कोई मायने नहीं हैं। वैक्सीन तैयार करना और दूसरी दुनिया में उसे पहुंचाना बहुत जरूरी है। भारत और दक्षिण अफ्रीका ने डब्ल्यूटीओ में ट्रिप्स की छूट का जो मुद्दा उठाया है उससे कोरोनावायरस महामारी के खिलाफ जंग में दुनिया को मदद मिलेगी। ऐसे छूट से बचने वाले देशों में भी विभाजित -19 की जांच, उपचार और टीकाकरण सुलभ होगा।





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