उत्तर प्रदेश जालौन

बुंदेलखंड का प्रमुख तीर्थ पंचनद संगम आध्यात्मिक साधना का केंद्र

० 12 नवंबर से स्नान पर्व व मेला पर जुड़ेंगे लाखों श्रद्धालु

० धार्मिक व पारंपरिक महोत्सव के लिए प्रशासन की तैयारी नाकाफी

उरई (जालौन)[गोविंद सिंह दाऊ]. । बुंदेलखंड के इकलौते आध्यात्मिक साधना के केंद्र पंचनद पर आगामी 12 नवंबर से शुरू होने बाले विशाल मेले व स्नान पर्व में जुटने वाले लाखों श्रद्धालुओं के लिए प्रशासनिक इंतजाम का अभी तक ककहरा भी शुरू न होने से स्थानीय निवासियों के चेहरे पर चिंता की लकीरें तैर रही है।
बुंदेलखंड के उत्तर-पश्चिम सीमा पर इटावा एवं औरैया,ब भिंड जिले की सीमा का बंटवारा करता जनपद जालौन के अंतर्गत देश का इकलौता पांच नदियों का संगम स्थल “पंचनद ” जिसके बारे में वेद एवं विभिन्न पुराणों ने वर्णन करते हुए इस तीर्थ को देश के अनेक तीर्थों की तुलना में श्रेष्ठ ने बताया है
पंचनद (5 नदियों का अनोखा और एकमात्र संगम) स्थल वैदिक काल व महाभारत कालीन सभ्यता से जुड़ा हुआ माना जाता है क्योंकि यहां पर विष्णु के सुदर्शन चक्र प्राप्त होने की घटना से लेकर महर्षि वशिष्ठ महाअथर्वण ऋषि की पौराणिक कथाओं के अतिरिक्त पांडवों से अज्ञातवास इसी इलाके मे बिताने का उल्लेख मिलता है। पांडवों के यहां पर अज्ञातवास बिताने के प्रमाण भी मिलते है ।महाभारत मे जिस बकासुर नामक राक्षस का ज्रिक किया जाता है उसे भीम ने इस इलाके के एक ऐतिहासिक कुएं मे मार करके डाला था। प्रयाग का त्रिवेणी संगम पूर्णतः धार्मिक मान्यता पर आधारित है क्योंकि धर्मग्रन्थों में वहां पर गंगा,यमुना के अलावा अदृश्य सरस्वती नदी को भी स्वीकारा गया है,यह माना जाता है कि कभी सतह पर बहने वाली सरस्वती नदी अब भूमिगत हो चली है बहराहल तीसरी काल्पनिक नदी को मान्यता देते हुये त्रिवेणी संगम का जितना महत्व है उतना साक्षात पांच नदियों के संगम को प्राप्त नहीं हो सका हैं। अरुणमय मधुमय देश हमारा, जहां पहुंच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा…..। स्पष्ट है कि शीर्षस्थ छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद ने भारत की श्रेष्ठता का बखान करने के लिए इन पंक्तियों की रचना की होगी। प्रसाद के इन्हीं उद्गारों के अनुरुप प्रकृति ने इस देश को एक ऐसी भी अनूठी श्रेष्ठता प्रदान की है कि कोई भी अन्य देश उसकी बराबरी तो क्या उससे दो तीन सीढ़ी नीचे तक नहीं पहुंच सका है।
पांच नदियों का यह संगम उत्तर प्रदेश में जालौन जिला मुख्यालय उरई से 65 किमी दूर कंजौसा गांव तथा इटावा जिला मुख्यालय से 65 किमी दूर कालेश्वर गढिया गांव में है। जहां पर कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान राज्य के लाखों की तादात में श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगता है। इस संगम को पंचनदा या पंचनद भी कहा जाता है,यहां के प्राचीन मंदिरों में लगे पत्थर आज भी दुनिया के इस आश्चर्य और भारत की श्रेष्ठ सांस्कृतिक धार्मिक विरासत का बखान कर रहे है। सारे विश्व में जालौन इटावा का पंचनद ही एक स्थल है,जहां पर पाचं नदियों का संगम हैं,यह नदियां यमुना, चंबल, सिंधु ,क्वारी, पहूज पवित्र सदानीरा सरिताये कलकल कर अनवरत प्रवाहित रहती है ।
उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड के उत्तर पश्चिम क्षेत्र में पांच नदियों के इस संगम की प्राकृतिक सुंदरता अद्वतीय है। अनेक प्रकार की वनस्पतियों से आच्छादित पंचनद का जंगल यूं तो दस्यु संरक्षण क्षेत्र के रूप में कुख्यात रहा है लेकिन धार्मिक दृष्टि से यह क्षेत्र बहुत ही महत्वपूर्ण है । यह प्राचीन तपोभूमि है । यह पृथ्वी का अद्भुत स्थल है यह भूमि सिर्फ ऋषि मुनियों के तप से तैयार नहीं हुई बल्कि प्रकृति ने स्वयं इस स्थल को अपने हाथों से सुघडता दी है। पंचनद पर विश्व की खूंखार नदी के रूप में विख्यात चंबल नदी है जिसके पानी में हिंसक जीव एवं चंबल की घाटी में हजारों हिंसक डाकू एवं इस नदी के आसपास गांव में रहने वाले लोग निर्भीक होते हैं किंतु पंचनद पर सूर्य तनया एवं यमराज की बहन यमुना में खूंखार नदी चंबल अपना आवेश एवं खूंखारता त्यागकर मां यमुना की गोद में समाहित होकर शांत हो जाती है । यह विश्व शांति एवं मोक्षदाई स्थल की खोज अन्वेषक ऋषियों ने करके यहां तपस्या करके सिद्धियां प्राप्त की है। श्रीमद् देवी भागवत के पंचम स्कंध के दूसरे अध्याय में श्लोक क्रमांक 18, 19, 20, 21, 22 के अनुसार महिषासुर के पिता रम्भ तथा चाचा करम्भ ने पुत्र प्राप्ति के लिए पश्चिम क्षेत्र में आकर तपस्या की थी । करम्भ ने पंचनद के पवित्र जल में बैठकर तप किया तो रम्भ ने दूध वाले वृक्ष के नीचे पंचाग्नि का सेवन कर तपस्या की । इंद्र ने मगरमच्छ का रूप धारण कर करम्भ को तपस्या करते हुए मार डाला । एक अन्य पुराण में पंचनद को विश्व का सबसे बड़ा तीर्थ माना जाता है । शिवपुराण के अनुसार देश में भगवान शंकर के 108 विग्रहों में पंचनद पर गिरीश्वर महादेव नाम से भगवान शिव का विग्रह पूजनीय है । मान्यता के अनुसार द्वापर में श्री कृष्ण द्वारा कालिया नाग को नथ कर उसका मानमर्दन कर ब्रज क्षेत्र की यमुना छोड़कर चले जाने को कहा। समुद्र जाते समय कालिया नाग ने कुछ समय तक पंचनद पर गिरीश्वर महादेव की पूजा करने से पंचनद पर मौजूद शिव के विग्रह का नाम कालेश्वर कहा जाने लगा। यह स्थान वेद वर्णित ऋषि अथर्वण उन्होंने अथर्ववेद की रचना की उनकी भी तपोस्थली रही है एवं जगत रचयिता ब्रह्मा जी के मानस पुत्र वशिष्ठ जी एवं भृगुवंशी ऋषि जमदग्नि की साधना स्थली एवं उनका आश्रम भी रहा है। यह गुप्तकाशी एवं गुप्त तीर्थ के रूप में जंगलों के बीच छिपा हुआ अति दुर्लभ तीर्थ स्थल है। आज भी यहां अनेक संतों का संगम होता रहता है । संवत 1133 में ग्राम लूट खावदा भरतपुर राजस्थान से जनार्दन वन नामक एक संत ने आकर पंचनद पर तपस्या प्रारंभ की । उन्हीं की शिष्य परंपरा की पीढ़ी के 19 वें संत श्री मुकुंदवन जी महाराज बहुत ही प्रसिद्ध संत हुए जिन्हें सम्मान के कारण बाबा साहब की उपाधि दी गई । उनकी प्रसिद्धि सुनकर गोस्वामी तुलसीदास जी स्वयं उनसे मिलने के लिए संवत 1660 में बसंत पंचमी के दिन पंचनद पर आए । दो प्रसिद्ध संतों का मिलन इस क्षेत्र में अनेक किंवदंतियों को जन्म दे गया।
यह क्षेत्र भौगोलिक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है यहां से इटावा भिंड औरैया जालौन उरई की समान दूरी है । प्रतिवर्ष कार्तिक मास की पूर्णिमा को यहां पर विशाल मेले का आयोजन होता है जिसमें उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश के लाखों श्रद्धालु पांच नदियों के संगम स्थल पंचनद में डुबकी लगाकर स्नान करते हैं । ऐसी मान्यता है कि यहां पर स्नान करने वाले को समस्त पापों से मुक्ति मिलती है एवं मोक्ष प्राप्त होता है और जन्म मृत्यु के चक्कर से जीव मात्र को मुक्ति मिल जाती है । पंचनद को पर्यटक क्षेत्र घोषित करने के लिए विभिन्न सरकारों में अनेक मंत्रियों ने प्रयास किए लेकिन उसे अंतिम मुकाम तक नहीं पहुंचाया परिणाम स्वरूप क्षेत्र विकास की दृष्टि से आज भी बहुत ही अधिक पिछड़ा हुआ है । प्राकृतिक सुंदरता एवं असीमित जलराशि तथा धार्मिक दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण स्थान की अनदेखी यहां के क्षेत्रवासियों को रास नहीं आ रही है । क्षेत्रीय समाजसेवी पंडित विजय द्विवेदी ,हरगोविंद सिंह सेंगर , राजकुमार द्विवेदी ,अनूप कुमार झा ,राहुल मिश्रा प्रधान जगम्मनपुर ,प्रमोद सिंह सेंगर, रामअवतार तिवारी मुनीम ,ए के मिश्रा,महेंद्र सिंह सेंगर पतराही आदि अनेक लोगों ने कई बार पचनद को पर्यटन क्षेत्र घोषित करने की मांग की जिसके परिणाम स्वरूप क्षेत्रीय विधायक मूलचंद्र निरंजन के प्रयास से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पंचनद को पर्यटक स्थल घोषित कर दिया है । 800 ईसा पूर्व पंचनद संगम पर बने महाकालेश्वर मंदिर एवं संत तपोस्थली श्री बाबा साहब के मंदिर पर साधु-संतों का जमावड़ा लगा रहता है। मन में आस्था लिए लाखों श्रद्धालु सिद्ध संत श्री बाबा साहब के दर्शन से पहले संगम में डुबकी अवश्य लगाते हैं। यह वह देवस्थल है जहां भगवान विष्णु ने महेश्वरी की पूजा कर सुदर्शन चक्र हासिल किया था। इस देव तीर्थ पर पांडु पुत्रों को कालेश्वर ने प्रकट होकर दर्शन दिए थे। इसीलिए हरिद्वार, बनारस, इलाहाबाद छोड़कर पंचनद पर श्री बाबासाहब तथा कालेश्वर के दर्शन के लिए साधु-संतों की भीड़ जुटती है। महत्वपूर्ण यह है कि यह दुनिया का एकमात्र वह स्थान है जहां एक साथ पांच नदियों का संगम है। पंचनदा के नाम से ख्याति अर्जित करने वाली इस तीर्थस्थली के बारे में बेशक लोगों को अधिक जानकारी न हो परंतु यह वह स्थान भी है जहां तुलसीदास ने संत मुकुन्दवन बाबासाहब से मिलने के उपरांत राम चरित मानस के कुछ महत्वपूर्ण अंशों की रचना की थी। इसलिए श्रद्धालुओं को मानना है कि पंचनदा जैसी दूसरी कोई तीर्थस्थली भारत में कहीं अन्यत्र हो ही नहीं सकती है।
इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि इतने पावन स्थान को यदि उस प्रकार से लोकप्रियता हासिल नहीं हुई जिस प्रकार से अन्य तीर्थस्थलियों को ख्याति नहीं मिली तो इसके लिए यहां का भौगोलिक क्षेत्र कसूरवार है। यहां तकरीबन दो सौ किमी के दायरे में फैला खतरनाक बीहड़ एवं उसमें पनपने वाले तमाम खूंखार डकैतों के कारण यहां भक्तों की अपेक्षित संख्या नहीं पहुंच पाई। यमुना, चंबल, क्वारी, सिंधु और पहुज के इस संगम स्थल को पर्यटन के रूप में दिक्षित करने के लिए सरकारों ने भी कोई कोई कारगर उपाय नहीं किए हैं। इसी का परिणाम है कि यह स्थान विकास कार्यों से पूरी तरह से उपेक्षित है। पंचनद के इस प्राचीन मंदिर को आदि काल से लेकर अब तक अनेक प्रसिद्ध संतो तथा बाबा मुकुंदवन की तपस्थली के कारण पवित्र माना जाता है।
पंचनद स्थित बाबा साहब के नाम से प्रसिद्ध मंदिर सघन वन एवं सामान्य मनुष्यों के लिए दुर्गम स्थल होने के कारण आदिकाल से संतो की तपोस्थली रहा है । स्कंदब पुराण के अनुसार महर्षि भृगु एवं जमदग्नि की तपोस्थली व आश्रम उनके बाद उनके ही कुल के भार्गव ऋषि महा अथर्वण (जावाली) जिन्होंने इसी पंचनद स्थित आश्रम में अथर्व वेद की रचना की थी । महर्षि जाबालि की पुत्री वाटिका का विवाह श्री कृष्ण द्वैपायन व्यास जी से हुआ था । श्रीमद् देवी भागवत पुराण के अनुसार महिषासुर के पिता रम्भ एवं चाचा करम्भ ने पुत्र प्राप्ति के लिए पंचनद क्षेत्र में आकर तपस्या की। करम्भ ने पंचनद के जल में बैठकर अनेक वर्ष तक तप किया तो रम्भ ने दूधवाले वृक्ष के नीचे पंचाग्नि का सेवन किया ।इंद्र ने भयभीत होकर मगरमच्छ का रूप धारण कर तपस्यारत करम्भ को मार डाला । जनश्रुति के अनुसार संवत 1660 की भादों की अंधेरी रात में यमुना नदी के माध्यम से गोस्वामी तुलसीदास कंजौसा घाट पहुंचे थे और उन्होंने मध्यधार से ही पानी पिलाने की आवाज लगाई थी, जिसे सुनकर बाबा मुकुंदवन ने कमंडल में पानी लेकर यमुना की तेज धार पर चल कर गोस्वामी तुलसीदास को पानी पिलाकर तृप्त किया था। बाद में रामभक्त महाकवि उनके आश्रम पर रुके और जगम्मनपुर किले के मैदान में उन्होंने भगवान राम की कथा सुनाई थी। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि बाबा साहब की अलौकिक शक्तियां उनकी रक्षा करती हैं जिसका प्रमाण है कि यहां पर कभी भी उपलवृष्टि नहीं हुई है। इसी के निकट काली मंदिर है । यहांबाबा साहब के चरण बने हुए हैं जिन पर पान या पांच बतासे रखकर श्रद्धालु माथा टेकते हैं। इस स्थल को विकसित करने की भी योजनायें भी बनाई गई लेकिन खूखांर डाकूओं के आंतक के चलते कोई भी विकास योजना सतह पर प्रभावी नहीं हो सकी।
पंचनदा पर बने द्वापरकालीन महाकालेश्वर मंदिर को सुदर्शन तीर्थ के नाम से भी ख्याति अर्जित की है। इसी स्थान पर ओम कालेश्वर व महाकालेश्वर दोनों शिवलिंग एक ही स्थान पर स्थापित हैं। जो समूचे विश्व में अन्यत्र कहीं नहीं देखे जा सकते हैं। इसका उल्लेख कूर्म पुराण के 82वें अध्याय में उल्लिखित है। जिसकी सूक्ष्म कथा देवी भागवत में भी देखने को मिलती है। यहां पहले कभी स्वर्ण निर्मित मंदिर हुआ करता था जो कलियुग के आरंभ होने के साथ ही पंचनद के कुंड में चला गया और पुनः पाषाण पूजा में महाकालेश्वर की प्रतिमा प्रकट हुई जो आज इस मंदिर में स्थापित है। इसे देव स्थान की संज्ञा इसी से मिलती है कि यहां ग्वालियर राज्य के महाराजा को भी नतमस्तक होकर पश्चाताप करना पड़ा और यहां के दैवीय चमत्कार होते देख महाराजा ने यहां मठ की स्थापना की।

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