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कोंच। वागीश्वरी साहित्य परिषद् की मासिक काव्य गोष्ठी श्री गुप्तेश्वर महादेव मंदिर में मोहनदास नगाइच की अध्यक्षता में हुई। शायर हसरत कोंचवी ने शहर देखकर अक्ल हैरान है, कत्ल करना यहां बहुत आसान है रचना सुनाकर वाहवाही लूटी।
काव्य गोष्ठी में कवि राजेंद्र सिंह रसिक ने रचना पाठ किया कि मुझको सम्मान नहीं, बस थोड़ा निर्मल प्यार चाहिए, प्रेम में ही जो मगन रहे, वो प्यारा दिलदार चाहिए। मुख्य अतिथि मुन्नालाल यादव ने दिल में आपकी हर बात रहेगी, जगह तो छोटी है पर आबाद रहेगी। नंदराम स्वर्णकार भावुक ने ईश्वर अंश होकर भी जीते देह में सब ही, मिथ्या देह का जीवन कष्टों का खजाना है।
मोहनदास नगाइच ने रचना बांची, भले ही सियासत को कम जानते हैं, मगर उनकी नीयत को हम जानते हैं। संतोष तिवारी सरल ने रचना बांची, अच्छों को कमजोर समझ बैठे हैं टुच्चों को बरजोर समझ बैठे हैं, भ्रष्ट तरीकों से जो धन अर्जित करते उनको ही सहजोर समझ बैठे हैं।
अमर सिंह यादव ने कविता पाठ किया, जहां में हर परमार्थी सज्जन नहीं होता, हर जंगल में चंदन नहीं होता। ओंकारनाथ पाठक ने व्यंग पढा, संघर्ष पिता से सीखा जाता है मां संस्कार सिखा ही देती है, चाय नाश्ता कपड़े धोना पत्नी खुद सिखा देती है।
संचालन कर रहे आनंद शर्मा अखिल ने रचना पाठ किया, ज्ञान जितना परिपक्व होता, वक्तव्य संक्षिप्त होता। इस दौरान चंद्रशेखर नगाइच मंजू, मुन्ना लोहे वाले, संतोष राठौर, रामकृष्ण वर्मा, रामबिहारी सोहाने, रमन सक्सेना, जफरुद्दीन, आशाराम मिश्रा, लक्ष्मीनारायण पुजारी, राजू रेजा आदि मौजूद रहे।

कोंच। वागीश्वरी साहित्य परिषद् की मासिक काव्य गोष्ठी श्री गुप्तेश्वर महादेव मंदिर में मोहनदास नगाइच की अध्यक्षता में हुई। शायर हसरत कोंचवी ने शहर देखकर अक्ल हैरान है, कत्ल करना यहां बहुत आसान है रचना सुनाकर वाहवाही लूटी।

काव्य गोष्ठी में कवि राजेंद्र सिंह रसिक ने रचना पाठ किया कि मुझको सम्मान नहीं, बस थोड़ा निर्मल प्यार चाहिए, प्रेम में ही जो मगन रहे, वो प्यारा दिलदार चाहिए। मुख्य अतिथि मुन्नालाल यादव ने दिल में आपकी हर बात रहेगी, जगह तो छोटी है पर आबाद रहेगी। नंदराम स्वर्णकार भावुक ने ईश्वर अंश होकर भी जीते देह में सब ही, मिथ्या देह का जीवन कष्टों का खजाना है।

मोहनदास नगाइच ने रचना बांची, भले ही सियासत को कम जानते हैं, मगर उनकी नीयत को हम जानते हैं। संतोष तिवारी सरल ने रचना बांची, अच्छों को कमजोर समझ बैठे हैं टुच्चों को बरजोर समझ बैठे हैं, भ्रष्ट तरीकों से जो धन अर्जित करते उनको ही सहजोर समझ बैठे हैं।

अमर सिंह यादव ने कविता पाठ किया, जहां में हर परमार्थी सज्जन नहीं होता, हर जंगल में चंदन नहीं होता। ओंकारनाथ पाठक ने व्यंग पढा, संघर्ष पिता से सीखा जाता है मां संस्कार सिखा ही देती है, चाय नाश्ता कपड़े धोना पत्नी खुद सिखा देती है।

संचालन कर रहे आनंद शर्मा अखिल ने रचना पाठ किया, ज्ञान जितना परिपक्व होता, वक्तव्य संक्षिप्त होता। इस दौरान चंद्रशेखर नगाइच मंजू, मुन्ना लोहे वाले, संतोष राठौर, रामकृष्ण वर्मा, रामबिहारी सोहाने, रमन सक्सेना, जफरुद्दीन, आशाराम मिश्रा, लक्ष्मीनारायण पुजारी, राजू रेजा आदि मौजूद रहे।





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