
अतीत का अलीगढ़
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हालात का असर अपराध पर जरूर पर पड़ता है। इसकी पुष्टि होती है 1837-38 में पड़े भीषण अकाल से। तंगहाली की स्थिति में बड़ी संख्या में लोगों ने जरायम का रास्ता अख्तियार कर लिया था। जिले की सड़कें बेहद असुरिक्षत हो चली थीं। दिनदहाड़े सड़कों पर लूट हो जाती थी। अंग्रेजों ने बड़ी साफगोई से लिखा है कि जिले में चारों ओर अपराधों की बाढ़ आ गई है। राहगीर, आम बाशिंदे, अनाज की गाड़ियां कुछ भी सुरक्षित नहीं थीं। इस हालात को राजस्थान की ओर से आए घुमंतू लुटेरों ने और विकट बना दिया था। जिले में अनाज के भंडार खत्म हो चले थे। ज्यादा पैसा देने पर भी खाने-पीने का सामान मुश्किल से मिलता था।
सोमना के जमींदार ठाकुर चंदन सिंह ने अकाल पीड़ितों को बांटा था एक लाख मन अनाज
1837-38 में खरीफ की फसल बुरी तरह से प्रभावित हुई थी और रबी की अच्छी फसल पर आशंकाओं के बादल मंडरा रहे थे। ऐसे में अंग्रेजों ने लोगों को राहत देने की कार्रवाई शुरू की। ग्रैंड ट्रंक रोड की मरम्मत के लिए ढेर सारे मजदूर लगाए गए। कलकत्ता (तात्कालिक नाम) स्थिति सेंट्रल कमेटी ने 6000 रुपये की राहत दी थी। तीन बार यह राशि मथुरा भेजी गई थी। कई बड़े जमींदार भी आम रियाया को दुख और परेशानी में राहत देने में जुट गए थे।
सोमना के जमींदार ठाकुर चंदन सिंह ने भुखमरी के शिकार लोगों को एक लाख मन अनाज बांटा था। अंग्रेज लिखते हैं कि अकाल से तो कम लोगों ने जान गंवाई लेकिन इसकी अपेक्षा लोग बीमारियों से ज्यादा मरे। इस दौर में कॉलरा भी तेजी से फैला। जिले के गरीब मुस्लिम वर्ग को इसने खासतौर पर शिकार बनाया था। पड़ोसी जिले बुलंदशहर में अकाल का असर ज्यादा देखने को मिला था।
