
अतीत का अलीगढ़
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अंग्रेज भारत की आजादी से 75 साल पहले ही फूट डालो राज करो की नीति पर अमल करते थे। मुसलमानों के बारे में उनकी सोच बेहद खराब थी। इसका सरकारी दस्तावेज खुलासा करते हैं। 1870 ईस्वी के आसपास दिल्ली से एटकिंसन नाम के अंग्रेज को अलीगढ़ का ब्योरा तैयार करने के लिए भेजा गया था। एटकिंसन अतरौली का ब्योरा देते हुए लिखता है कि स्थानीय मुस्लिम बाशिंदे हमेशा बदनाम रहे हैं। उसकी मंशा मुस्लिमों के हिंसा में लिप्त रहने को लेकर थी। क्योंकि बाद में उसने कुछ घटनाओं का जिक्र भी किया है। लेकिन इक्की-दुक्की घटनाओं को लेकर पूरे मुस्लिम समाज के बारे में सामान्य राय कायम करना उनकी कुटिल नीति का हिस्सा रही है।
एटकिंसन की ओर से अलीगढ़ के बारे में तैयार विस्तृत ब्योरा 1878 में अलीगढ़ गजेटियर के रूप में सामने आया था। वह लिखता है कि ये लोग (मुसलमान) हिंदुओं से धर्मांतरित थे। मुस्लिम अंग्रेजों से नफरत करते थे। उनमें अंग्रेजी शासन के प्रति रोष का भाव था। सितंबर 1857 से पूर्व अलीगढ़ की तहसील अतरौली का निजाम एक तरह से मुसलमानों के हाथ में था। सितंबर 1857 में अलीगढ़ में अंग्रेज कमिश्नर मिस्टर कॉक ने अंग्रेजी शासन के एक विश्वासपात्र अफसर मुहम्मद अली को अतरौली में ज्वाइंट मजिस्ट्रेट और दाऊद खान को उसके सहयोगी के तौर पर भेजा था।
लेकिन मुसलमानों ने उनके प्रशासन से बगावत कर दी। 25 सितंबर को उन्होंने मोहम्मद अली की हत्या कर दी। इस हत्या से भड़के अंग्रेजों ने चुन-चुन कर बागी लोगों को सजा दी थी। बागियों को सजा देने का तो जिक्र अंग्रेजी शासनकाल के दस्तावेज में है लेकिन कितने लोगों को किस जुर्म में क्या सजा दी गई, इसका उल्लेख नहीं है। समझा जाता है कि बगावत को दबाने के लिए अंग्रेजों ने बहुत से निर्दोष लोगों पर कहर ढाया था।
