सूत्रों का कहना है कि अधीक्षक शनिवार और रविवार को अपने घर आगरा चले जाते हैं और सोमवार को दो दिनों की गेटबुक में खाली लाइन भरते हैं। जेल सूत्रों के अनुसार, जेल कैंटीन से लेकर बंदी रक्षकों की ड्यूटी तक, हर जगह अवैध कमाई का खेल चल रहा है। इसमें एक बंदी रक्षक, राहुल चौधरी, का नाम प्रमुखता से उभर रहा है।
कहने को तो वह जेल अधीक्षक का ड्राइवर है, लेकिन उसका रौब इतना है कि बंदी उसे ‘सेकंड जेलर’ के नाम से जानते हैं। अधीक्षक का विश्वासपात्र होने के कारण, वह बंदी रक्षकों की ड्यूटी में भी हस्तक्षेप करता है। जिस सिपाही की ड्यूटी वह चाहता है, उसी की ड्यूटी लगाई जाती है।
कैंटीन से होने वाली हजारों रुपयों की आमदनी की वसूली भी वही करता है। जेल में आने वाले नए बंदियों से भी भारी भरकम वसूली की जाती है। सूत्रों का यहां तक कहना है कि जेल अधीक्षक के बाद, यह बंदी रक्षक जेल के अंदर खुलेआम मोबाइल लेकर चलता है। यह सब कुछ सीसीटीवी कैमरों में कैद है।
बंदी भागने पर सिपाही पर प्राथमिकी तो जेल कर्मियों पर क्यों नहीं?
पांच दिन पूर्व जिला कारागार की दीवार फांदकर बंदी अंकित और डिंपी उर्फ शिवा फरार हो गए थे। जेलर विनय प्रताप सिंह ने इन बंदियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी। इसके बाद, दो सिपाही नवीन कुमार, अतुल मिश्रा, शिवेंद्र यादव, डिप्टी जेलर बद्री प्रसाद और जेलर विनय प्रताप सिंह को निलंबित कर दिया गया है।




