कानपुर में अभियुक्तों का गुनाह समाज में अराजकता और रिश्तों में अविश्वास पैदा करने वाला है। गुनाह ऐसा नहीं है कि दया दिखाई जाए। यह टिप्पणी कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए की। कोर्ट ने कहा कि मृतक 16 साल का अबोध बालक था, जिसे रचिता पहले ट्यूशन पढ़ाती थी। ट्यूशन पढ़ाने के दौरान कुशाग्र की मां सोनिया से रचिता के घरेलू संबंध हो गए थे। सोनिया रचिता को बच्चे की तरह प्यार करती थी।
रचिता ने प्रभात को अपना पुरुष मित्र बताकर दोनों से मिलवाया और बाद में संबंधों का फायदा उठाकर 30 लाख रुपये की फिरौती के लिए अपहरण करके हत्या कर दी। यह समाज में अध्यापक और विद्यार्थी के संबंधों को कलंकित करने वाला है। एक ऐसा बालक जिसकी अभियुक्तों से कोई दुश्मनी नहीं थी, उसने उकसावे का कोई कृत्य नहीं किया था। वह पूरी तरह निर्दोष व असहाय था और अभियुक्तों के रिश्तों और सामाजिक मानदंडों के भरोसे पर निर्भर था।

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रोते बिलखते कुशाग्र के माता-पिता
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संतुलन परीक्षण अपनाया जाना जरूरी
भरोसेमंद व्यक्ति ने ही निर्मम तरीके से उसके गले व हाथ-पैर रस्सी से बांधकर गला घोंटकर हत्या की गई, जो गंभीर अपराध है। कोर्ट की ओर से कहा गया कि विरल से विरलतम अपराध पर विचार करने के बाद आपराधिक परीक्षण के समय संतुलन परीक्षण अपनाया जाना जरूरी है। मुकदमा परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित है। ऐसे मामलों में अभियुक्तों की उम्र व अपराध की परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए ही सजा सुनाई गई।

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ट्यूशन टीचर को जेल ले जाती पुलिस
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रचिता, प्रभात व शिवा को मिली सजा
- धारा 364 क सपठित धारा 34 (अपहरण व सामान्य आशय से किया गया अपराध) के तहत उम्रकैद और 50 हजार रुपये जुर्माना।
- धारा 302 सपठित धारा 34 (हत्या व सामान्य आशय से किया गया अपराध) के तहत उम्रकैद और 50 हजार रुपये जुर्माना।
- धारा 201 सपठित धारा 34 (सबूत मिटाने व सामान्य आशय से किया गया अपराध) के तहत सात साल कैद और 10 हजार रुपये जुर्माना।

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प्रेमी प्रभात और उसका साथी
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सुप्रीम कोर्ट की दो विधि व्यवस्थाओं का दिया हवाला
कोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट की दो विधि व्यवस्थाओं का हवाला देते हुए साफ किया कि उम्रकैद का मतलब हत्यारों को जीवन भर जेल में कैद रखना है। सुप्रीम कोर्ट की किरन बनाम स्टेट ऑफ कर्नाटक 2025 की विधि व्यवस्था में कहा गया है कि जहां मृत्युदंड के बजाय आजीवन कारावास का दंडादेश हो, अपराध गंभीर हो और नृशंसतापूर्वक किया गया हो।

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जानकारी देते कुशाग्र के चाचा
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जीवनकाल तक का दंडादेश माना
ऐसे मामलों में आनुपातिक रूप से मृत्युदंड के दंडादेश से बचते हुए बीच का रास्ता अपनाना चाहिए। मृत्युदंड की सजा को उम्रकैद में बदलते हुए कहा कि अभियुक्तों को अंतिम सांस तक जेल से रिहा न किया जाए। इसी तरह सुप्रीम कोर्ट ने यूनियन ऑफ इंडिया बनाम वी श्रीहरन उर्फ मुरगन व अन्य 2015 की विधि व्यवस्था में कहा है कि उम्रकैद का अर्थ, अभियुक्त के शेष प्राकृत जीवनकाल तक का दंडादेश माना जाएगा।
