
गंगा महोत्सव में मालिनी अवस्थी
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गंगा महोत्सव का मुक्ताकाशीय मंच। हल्की सी सर्दी। मंच के सामने थोड़े से सिकुड़े हुए दर्शक। जैसे ही मंच पर मालिनी अवस्थी के आने की घोषणा हुई तो हर कोई चैतन्य हो उठा। मालिनी ने मंच संभाला बाबा विश्वनाथ, मां गंगा और मां अन्नपूर्णा को प्रणाम करने के बाद अपनी खनकती आवाज में हर-हर महादेव का जयघोष किया।
शुक्रवार की देर रात गंगा महोत्सव की दूसरी निशा में मालिनी ने अपने गायन की शुरूआत निमिया की डाली मैया डाले ली झूलनवा…से की। गीतों से माता की आराधना करने के बाद उन्होंने रामजी के भईले जनमवा…की तान छेड़ी तो दर्शक दीर्घा से जय श्रीराम का जयघोष गूंजने लगा। इसके बाद उन्होंने श्रीराम और सीता के विवाह के प्रसंग पर आधारित गीत झुकी जैहो कुंवर रघुवीर लाली मोरी छोटी हैं…को स्वर दिया। विवाह गीतों की शृंखला को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने नीक लागे सिया के बलमुआ अंगनवा के बीच…और लोगवा देत काहें गारी बता द बबुआ…को अपने सुमधुर स्वरों में साकार किया। कार्तिक के महीने में मालिनी ने जब होरी खेले मसाने में…को स्वर दिया तो दर्शक भी खुद को झूमने से नहीं रोक सके। गंगा के समानांतर प्रवाहित हो रही सुरों की अभ्यर्थना दर्शकों में भक्ति के भाव के रस को घोल रही थी। इसके बाद उन्होंने गंगा रेती पे बंगला की प्रस्तुति दी। समापन उन्होंने रेलिया बैरन पिया को लिए जाए रे, जौन टिकसवा से बलम मोरे जैहें, रे सजना मोरे जैहें, पानी बरसे टिकस गल जाए रे, रेलिया बैरन…से किया।
इसके पूर्व गंगा महोत्सव के दूसरे दिन की शुरूआत शास्त्रीय गायिका डॉ. अर्चना आदित्य म्हस्कर के गायन से हुई। उन्होंने राग मारु विहाग में विलंबित एक ताल में ए पइयां तोरे लागूं… के बाद मध्य लय तीन ताल में रात के अलसाए पियरवा…पेश किया। तीसरी प्रस्तुति में द्रुत तीन ताल में सघन घन बोले रे..के बाद समापन उन्होंने मराठी अभंग अबीर गुलाल…से किया। उनके साथ तबले पर श्रीकांत मिश्रा और हारमोनियम पर कुमार विक्की ने संगत की। इसके बाद आशुतोष श्रीवास्तव का भजन गायन, दीपक सिंह का लोकगायन, पं. अंशुमान महाराज का सरोद वादन, दिव्या व राहुल का ओडिसी एवं भरतनाट्यम नृत्य फ्यूजन आकर्षण का केंद्र रहा। अंतिम प्रस्तुति के पद्मजा रेड्डी के कुचीपुड़ी नृत्य की रही।
