फिल्म के नाम पर उठे राजनीतिक विवादों पर सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि समाज के कुछ लोगों का दुरुपयोग, उसी समाज के खिलाफ करती है। किसी समाज विशेष को लक्षित, चिन्हित, टारगेट करके ‘अपमानित-आरोपित’ करती है। उन्होंने फिल्म का नाम लिए बगैर कहा कि फिल्म का शीर्षक केवल आपत्तिजनक नहीं, बेहद अपमानजनक भी है। 

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उस फिल्म का नाम लिखने से भाजपा का उस समाज का तिरस्कार करने का उद्देश्य और भी अधिक पूरा होगा। ऐसा सिनेमा नाम बदलकर भी रिलीज नहीं होना चाहिए। जब निर्माताओं को आर्थिक हानि होगी, तभी ऐसी फ़िल्में बनना बंद होंगी क्योंकि पैसे के लालच में भाजपा का एजेंडा चलाने वाले भी भाजपाइयों की तरह पैसे को छोड़कर किसी और के सगे नहीं हैं।

अखिलेश ने कहा कि ये ‘रचनात्मक स्वतंत्रता’ या ‘क्रिएटिव लिबर्टी’ के हनन की बात नहीं है, ये ‘रचनात्मक समझ’ या कहिए ‘क्रिएटिव प्रुडेंस’ की बात है कि पूर्वाग्रह से ग्रसित जो फिल्म किसी एक पक्ष की भावनाओं को, एक सोची-समझी साजिश के तहत आहत करे वो मनोरंजन कैसे हो सकती है। 

अगर उद्देश्य मनोरंजन नहीं है तो किसी एक समाज को बदनाम करने के एजेंडे के पीछे के एजेंडे का खुलासा भी होना ही चाहिए। इसका भी भंडाफोड़ होना चाहिए कि इसके पीछे कौन है और कोई क्यों अपना पैसा और दिमाग़ ऐसे सामाजिक एकता विरोधी-विध्वंसकारी काम में लगा रहा है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तभी तक स्वीकार्य होती है जब तक वो किसी अन्य की गरिमा-प्रतिष्ठा का हनन नहीं करती है। उन्होंने कहा कि सिनेमा को समाज का दर्पण समझा जाता है लेकिन ये दर्पण मैला और मलिन नहीं होना चाहिए।



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