आगरा के यमुना का किनारा और चीनी मिट्टी की तरह चमकती नीली टाइल का जादू, ऐसा अनूठा स्मारक चीनी का रोजा अपने इन्हीं नीले टाइल्स के कारण लोगों के आकर्षण का केंद्र था, लेकिन अब संरक्षण में लापरवाही से ईरानी वास्तुकला का यह नमूना तिल-तिल दम तोड़ रहा है।
रामबाग चौराहे से एत्माद्दौला की ओर महज 400 मीटर चलने पर सड़क किनारे नर्सरी का जाल बिछा है। दायीं तरफ की गलियों में करीब 200 मीटर अंदर यमुना किनारे यह स्मारक मौजूद है। मुख्य द्वार पर चमेली के फूलों की महक तो है, लेकिन भीतर कदम रखते ही बदहाली की टीस उसे दबा देती है। सैलानियों के नाम पर यहां सन्नाटा पसरा है। स्मारक तक जाने वाली सड़क पर पक्के मकान हैं, जिनसे यह अब सड़क से नजर नहीं आता। सभी के खिलाफ एफआईआर दर्ज है, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। स्मारक के ठीक पीछे स्थित काली गुंबद तक जाने के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं।
आधा-अधूरा काम और बजट की कमी
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने वर्ष 2022-23 में बाहरी दीवारों पर सफेद चूना-पुट्टी का काम शुरू कराया था, लेकिन बजट की कमी बताकर बीच में ही छोड़ दिया गया। देखरेख के अभाव में स्मारक के बुर्ज ढहकर नदी में समा चुके हैं। गुंबद से टाइल्स झड़ रहे हैं।
हुनर जो मलबे में हो रहा तब्दील
यह स्मारक शाहजहां के वजीर अफजल खान शिराज़ी का है। वर्ष 1635 में उन्होंने अपने जीवित रहते ही अपने मकबरे के रूप में बनवाया था। वह ईरान के शिराज शहर से आए थे। इस स्मारक में इस्तेमाल की गई टाइल्स और ग्लेज का काम तत्कालीन चीनी मिट्टी के बर्तनों जैसा झलकता था। फिरोजा, गहरा नीला, पीला और हरा रंग यहां दिखता है। यह पहला स्मारक है, जहां काशीकारी का उपयोग किया गया। चमकदार टाइलों को बनाने के लिए खास तरह की मिट्टी, कांच और विभिन्न धातुओं के ऑक्साइड का उपयोग किया जाता था।
ये बोले जिम्मेदार
बजट की कमी से संरक्षण कार्य में रुकावट आई है। वार्षिक देखभाल और रखरखाव का बजट मिलता है। इस स्मारक को सहेजा जाएगा और इसके व्यापक संरक्षण के लिए जल्द ही नया प्रस्ताव भेजा जाएगा। – स्मिथा एस कुमार, अधीक्षण पुरातत्वविद
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