Muzaffarnagar की सर्कुलर रोड पर स्थित रेलवे फाटक वाला चौक, जिसे लंबे समय तक स्थानीय पहचान के रूप में रेशू चौक कहा जाता रहा, अब अचानक सियासी अखाड़ा बन गया है। हाल ही में इस चौक का नामकरण बदलकर चौधरी चरण सिंह चौक कर दिया गया। नाम बदलते ही शहर की राजनीति में हलचल मच गई और यह मामला देखते ही देखते गलियों से निकलकर राजनीतिक गलियारों तक जा पहुंचा।

इस पूरे Muzaffarnagar chowk name dispute में सबसे मुखर होकर सामने आए भाजपा नेताओं से अपने आप को जुड़ा बताने वाले सत्य प्रकाश रेशू। उन्होंने न केवल नाम परिवर्तन पर आपत्ति जताई, बल्कि जाट समाज के कुछ नेताओं पर सरकारी बोर्ड पर जबरन कब्जा करने और उस पर चौधरी चरण सिंह के नाम की फ्लेक्स लगाने का आरोप भी लगाया।


प्रेस वार्ता में उठे आरोप, लेकिन साथ देने वाला कोई नहीं

सत्य प्रकाश रेशू ने अपने आवास पर बाकायदा एक पत्रकार वार्ता आयोजित की। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने जाट समाज के विभिन्न वर्गों, संगठनों और कुछ प्रमुख नेताओं को आमंत्रित किया, यह उम्मीद करते हुए कि शायद कोई उनके पक्ष में खड़ा होगा। विडंबना यह रही कि लोग आए जरूर, लेकिन जैसे ही विवाद की गंभीरता सामने आई, लगभग सभी ने अपने हाथ खड़े कर दिए। नतीजा यह रहा कि सत्य प्रकाश रेशू अकेले खड़े नजर आए—मंच पर भी और राजनीति में भी।

पत्रकारों के सवालों के जवाब देते हुए उन्होंने खुद को “अन्याय का शिकार” बताते हुए कहा कि यह पूरा घटनाक्रम उनके मान-सम्मान से जुड़ा है। लेकिन सियासत में सम्मान से ज्यादा संख्या और समीकरण चलते हैं, यह तस्वीर उसी वक्त साफ हो गई।


Muzaffarnagar chowk name dispute: मंत्री से बात, लेकिन मुलाकात नसीब नहीं

सत्य प्रकाश रेशू का दावा है कि उन्होंने इस पूरे मामले को लेकर नगर विधायक और उत्तर प्रदेश सरकार में राज्य मंत्री कपिल देव अग्रवाल से भी बात की थी। रेशू के अनुसार मंत्री ने उनसे कहा था कि “मैं शीघ्र तुमसे मिलूंगा”, लेकिन इसके बाद न कोई फोन आया, न संदेश और न ही मुलाकात।

यहां से कहानी ने नया मोड़ लिया। रेशू ने अपने समर्थन में यह भी कहा कि उन्होंने कुछ भाजपा नेताओं से कपिल देव अग्रवाल के संदर्भ में बातचीत की थी। लेकिन प्रेस वार्ता के दौरान मौजूद भाजपा नेताओं ने मौके पर ही इस बात का खंडन कर दिया और साफ कहा कि उनसे ऐसी कोई चर्चा नहीं हुई।

राजनीति में इसे कंधे का इस्तेमाल कहें या रणनीतिक दूरी—रेशू के दावे वहीं हवा हो गए।


जाट समाज और रालोद सक्रिय, भाजपा में चुप्पी

इस पूरे प्रकरण में एक बात साफ दिखी—जहां रालोद और उससे जुड़े जाट नेता खुलकर सामने आए, वहीं भाजपा के अधिकांश लोग दूरी बनाते नजर आए।
भाजपा–रालोद गठबंधन और आने वाले चुनावी वर्ष को देखते हुए पार्टी के कई नेता इस विवाद से पल्ला झाड़ते दिखे। कोई खुलकर बोलने को तैयार नहीं, कोई बयान देने से बच रहा है।

नगर विधायक और राज्य मंत्री कपिल देव अग्रवाल, जो आमतौर पर हर गली-मोहल्ले और छोटे-बड़े कार्यक्रमों में सक्रिय दिखते हैं, इस मामले में पूरी तरह खामोश नजर आए। यह खामोशी राजनीतिक मजबूरी है या सोची-समझी रणनीति—यह सवाल अब शहर में चर्चा का विषय बन गया है।


Muzaffarnagar chowk name dispute: धमकी और कब्जे के आरोप

सत्य प्रकाश रेशू ने एक और गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उन्हें धमकी दी गई कि “मिट्टी में मिला दिया जाएगा।”
इसके साथ ही उन्होंने यह भी दावा किया कि उनके यूनिफॉर्म पर जबरन कब्जा कर लिया गया है। इन आरोपों के आधार पर उन्होंने कानूनी कार्रवाई करने की बात कही है।

हालांकि अभी तक न तो किसी प्राथमिकी की पुष्टि हुई है और न ही प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस कदम सामने आया है। ऐसे में यह मामला बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप तक ही सीमित नजर आ रहा है।


समर्थन की तलाश में कोटद्वार तक, फिर भी निराशा

अपनी बात को और मजबूत करने के लिए सत्य प्रकाश रेशू ने कोटद्वार से चौधरी चरण सिंह के अनुयायी, आधुनिक भीम और करण आश्रम के प्रणेता विश्व पाल जयंत को भी बुलाया।
लेकिन यहां भी उन्हें अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। जयंत ने चौधरी चरण सिंह के जीवनकाल की बातें जरूर कीं, लेकिन मौजूदा विवाद पर खुलकर बोलने से इनकार कर दिया।

इससे यह साफ हो गया कि बड़े नामों की मौजूदगी भी इस विवाद में रेशू के लिए ढाल नहीं बन पाई।


राजनीतिक गलियारों में चर्चा: कौन किसका मोहरा?

फिलहाल रेशू चौक से चौधरी चरण सिंह चौक बनने का मामला शहर के राजनीतिक गलियारों में गर्म बहस का विषय बना हुआ है।
कुछ लोग इसे सम्मान का सवाल बता रहे हैं, तो कुछ इसे राजनीतिक स्टंट और “दूसरों के कंधे पर बंदूक रखकर चलाने” की कोशिश के रूप में देख रहे हैं।

आरोप यह भी लग रहे हैं कि सत्य प्रकाश रेशू इस पूरे मामले में खुद को भाजपा से जोड़कर दबाव बनाना चाहते हैं, लेकिन पार्टी का शीर्ष नेतृत्व और स्थानीय नेता फिलहाल इस खेल से दूरी बनाए हुए हैं।


मुजफ्फरनगर में चौक के नामकरण से शुरू हुआ यह विवाद अब केवल नाम का नहीं, बल्कि राजनीतिक ताकत, गठबंधन की मजबूरी और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का आईना बन चुका है। जहां एक ओर चौधरी चरण सिंह के नाम पर सियासत गरमाई हुई है, वहीं दूसरी ओर सत्य प्रकाश रेशू अकेले पड़ते नजर आ रहे हैं। अब देखना यह है कि Muzaffarnagar chowk name dispute आने वाले दिनों में समाधान की ओर बढ़ता है या फिर राजनीतिक शह-मात का एक और उदाहरण बनकर रह जाता है।





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