17 heroes of Mathura had written the story of victory with their martyrdom.

1971 भारत-पाकिस्तान युद्ध
– फोटो : सोशल मीडिया

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 मथुरा के 17 वीरों ने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में अदम्य साहस का परिचय देते हुए अपना बलिदान दिया था। युद्ध विजय को आज 52 साल हो चुके हैं। युद्ध में शामिल अधिकतर नौजवान शहीद हो गए थे। इनमें से कई ऐसे थे, जिनके हाथों से शादी की मेहंदी तक नहीं छूटी थी। अग्नि को साक्षी मान लिए सात फेरों का वचन तो न निभा सके, लेकिन धरती मां से किया वादा पूरा कर उसी की गोद में हमेशा के लिए सो गए।

युद्ध विजय को बेशक लंबा समय बीत चुका है, लेकिन परिजन अपने लाडलों की यादों को अब भी संजोए हुए हैं। वे बताते हैं कि उस समय के नियम के अनुसार शहीदों के शव घर-गांव नहीं लाए गए। युद्ध भूमि में ही अंतिम संस्कार किया गया। इस कारण वे अपने लाडलों का आखिरी बार चेहरा तक नहीं देख पाए थे। संवाद

गोविंद का छूटा साथ ठाकुर जी का थामा हाथ

1971 के युद्ध में शहीद सिपाही गोविंद निवासी वृंदावन का युद्ध से कुछ समय पहले ही रामवती से गौना हुआ था। रामवती अब 70 साल की है। वृंदावन में स्थित घर में ही मंदिर बना लिया है। रामवती ने गोविंद के शहीद होने के बाद दूसरा विवाह नहीं किया। उन्होंने श्रीठाकुर बांके बिहारी को ही अपना सब कुछ मान लिया। वह बताती हैं कि एक गोविंद ने साथ छोड़ा तो क्या हुआ उसी के दूसरे रूप ठाकुरजी ने तो हाथ थाम लिया। उन्होंने घर में शहीद गोविंद की प्रतिमा भी बनवाई है और रोज पूजा भी करती हैं।

हल्दी-मेहंदी छूटने से पहले धौर्रा देवी का जगन्नाथ हुआ शहीद

सिपाही जगन्नाथ निवासी रान्हेरा महज 21 साल की उम्र में देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दे गए। उनकी पत्नी वीरांगना धौर्रा देवी ने बताया कि हल्दी-मेहंदी छूटने से पहले पति को युद्ध के लिए बुलावा आ गया था। वह लड़ने गए तब उनका आखिरी बार चेहरा देखा था। युद्ध में शहीद होने पर उनका शव मथुरा नहीं लाया गया। युद्ध भूमि पर ही उनका अंतिम संस्कार हुआ। वह बताती हैं कि उनको कोई औलाद नहीं है। सरकार से मिले पांच बीघा खेत से जीवनयापन कर रही हैं।

युद्ध के साक्षी खेमचंद और प्रेमपाल

1971 के युद्ध में शामिल मथुरा के वीर खेमचंद शर्मा नगेश और प्रेमपाल का सीना भारतीय फौज की वीरता के बारे में बताते हुए गर्व से चौड़ा हो जाता है। खेमचंद बताते हैं कि सेना ने इस युद्ध में अदम्य साहस का परिचय देते हुए पाकिस्तानी फौज के दांत खट्टे कर दिए थे। वे उस समय सेना के टैंक स्क्वार्डन में बतौर शिक्षा अनुदेशक तैनात थे। 4 दिसंबर 1971 की सुबह पूर्वी पाकिस्तान के मियां बाजार क्षेत्र को कब्जे में लेने का आदेश मिला, जिसके लिए हमारे टैंकों ने दुश्मन द्वारा बिछाई गई टैंकरोधी सुरंग और भीषण गोलाबारी की परवाह न करते हुए दुश्मन से डटकर मुकाबला किया। दुश्मन के अनेक सैनिक मारे गए। युद्ध में हमारे दो टैंक भी बर्बाद हो गए थे। प्रेमपाल बताते हैं कि उन्हें लोग युद्ध विजेता के तौर पर जानते हैं। उस युद्ध की जीत ने एक अलग पहचान दी। समाज, जिले और देश में सम्मान मिला। देश की रक्षा के लिए आज भी भुजाएं फड़कती हैं।

मथुरा जनपद के ये सैनिक हुए थे शहीद

सिपाही नारायण सिंह निवासी पैगाम, चरण सिंह बछगांव, ओमप्रकाश देवियां का नगला, केदार सिंह सौंख, गोविंद सिंह वृंदावन, जगन्नाथ रान्हेरा, मंगल सिंह, मथुरा, महेंद्र सिंह जादव, जादवपुर बरौली, महेंद्र सिंह निवासी दलगढ़ी बाजना, सोनपाल सिंह जादवपुर, राम शरण सिंह निवासी धनौती, जुगसुना, नेनु सिंह शेरगढ़, लांस नायक विपत्ति निवासी डॉमपुरा पेठा, सिपाही कमरपाल, वियोही, चंद्रवीर सिंह मथुरा, छतर सिंह भवनपुरा और सिपाही ओमप्रकाश निवासी कारव।



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