ड्राइविंग लाइसेंस से जुड़े काम करने वाले प्राइवेट कर्मियों से सैलरी का पैसा मांगा जा रहा है। 13 हजार रुपये जमा करने पर यही धनराशि उन्हें सैलरी के रूप में देने की बात कही जा रही है। उनसे वेबकैम, कम्प्यूटर खरीदवाए गए हैं, जिसका बिल कंपनी के नाम बनवाने का दबाव बनाया जा रहा है। इतना ही नहीं ऐसा नहीं करने पर नौकरी से बाहर निकालने की धमकी भी दी जा रही है।
मामला परिवहन विभाग से जुड़ा है, जिसकी शिकायत परिवहन राज्यमंत्री दयाशंकर सिंह तक पहुंच गई है। जांच कराकर दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी। दरअसल, परिवहन विभाग में ड्राइविंग लाइसेंस बनाने, उनकी प्रिंटिंग, डिलीवरी का कामकाज निजी एजेंसियों के पास है। गत वर्ष तक यह काम स्मार्ट चिप देखती थी। लेकिन अब प्रदेशभर में तीन कंपनियों को यह ठेका दिया गया है। इसमें सिल्वर टच, फोकॉम नेट व रोजमार्टा शामिल हैं। प्रदेशभर में 320 प्राइवेट कर्मी इन कंपनियों के अंतर्गत कार्य करते हैं। शिकायत फोकॉम नेट प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ आई है।
फोकॉम नेट के पास कानपुर व आगरा जोन के करीब 25 जिले हैं, जहां डीएल के कामकाज के लिए करीब 120 प्राइवेटकर्मियों को भर्ती किया गया है। कर्मचारियों का आरोप है कि फोकॉम के प्रोजेक्ट मैनेजरों तुषार गर्ग व सुभाष गिरी ने उनसे कम्प्यूटर, वेबकैम व अन्य सिस्टम खरीदवाए। फिर इसका बिल कंपनी के नाम बनवाने का दबाव डालने लगे। इतना ही नहीं प्रोजेक्ट मैनेजरों ने कर्मचारियों से तनख्वाह का पैसा मांगा। कहा गया कि तनख्वाह का पैसा पहले भेजना होगा, फिर कंपनी की ओर से यही पैसा सैलरी के रूप में दिया जाएगा। ऐसा प्रतिमाह करना होगा। सूत्र बताते हैं कि आगरा जोन में कई प्राइवेटकर्मियों ने सैलरी के 13 हजार रुपये प्रोजेक्ट मैनेजरों को भेजे भी। हालांकि सुभाष गिरी का कहना है कि प्राइवेटकर्मी जानबूझकर उन्हें फंसाने का प्रयास कर रहे हैं। जबकि तुषार गर्ग ने मामले पर बात करने से इनकार कर दिया।
लखनऊ के होटल में हुई थी बैठक
निजी कंपनी के प्रोजेक्ट मैनेजरों ने कर्मचारियों पर दबाव डालने के उद्देश्य से हाल ही में लखनऊ के एक होटल में बैठक भी बुलाई थी। जहां उन्होंने कम्प्यूटर, वेबकैम के बिल कंपनी के नाम बनवाने तथा सैलरी का पैसा खातों में जल्द से जल्द भेजने का फरमान जारी किया था। बैठक की जानकारी परिवहन आयुक्त कार्यालय में होने पर प्रोजेक्ट मैनेजरों को फटकार भी लगाई गई थी।
कर्मियों के पास वीडियो, रिकॉर्डिंग
सूत्र बताते हैं कि डीएल से जुड़े काम करने वाली एजेंसियों के अधिकतर कर्मचारियों से भर्ती के नाम पर वसूली हुई है। ऐसे में कर्मचारियों ने उन पर दबाव बनाने वाले प्रोजेक्ट मैनेजरों के खिलाफ मुखर होने का निर्णय लिया है। साथ ही आवश्यकता पड़ने पर वीडियो व कॉल रिकॉर्डिंग सार्वजनिक करने की बात कह रहे हैं।
