बार एसोसिएशन के पूर्व महामंत्री राकेश तिवारी से शनिवार को पुलिस ने लगभग नौ घंटे पूछताछ की और देर रात उनकी रिहाई हुई। हिरासत में लिए जाने से रिहाई तक की पूरी व्यथा राकेश ने बताते हुए कहा कि एक पल के लिए लगा कि जैसे मेरा अपहरण हो गया है…। हालांकि पूछताछ के दौरान पुलिस द्वारा किसी तरह की बदसलूकी किए जाने से राकेश ने इन्कार किया।

राकेश ने बताया कि वह कचहरी से एनआरआई सिटी पहुंचे थे। मिनी बाजार से सामान खरीदा और जैसे ही बाहर निकले चार-पांच गाड़ियों से सादी वर्दी में आए 20-25 लोगों ने उन्हें घेर लिया। बिना कुछ बताए गाड़ी में बैठने को कहा। गाड़ी में बैठने पर एक पुलिसकर्मी को उन्होंने पहचान लिया तब पता चला कि उन्हें गिरफ्तार किया गया है। पुलिस की गाड़ियां भी नहीं थीं। नंबर प्लेट पर भी मिट्टी जमा थी जिससे नंबर नहीं पढ़े जा सकते थे। किसी ने उनके घर पर सूचना दी। बेटे ने बार एसोसिएशन के महामंत्री को फोन किया। उन्होंने पुलिस कमिश्रर से बात की तब जानकारी हुई कि राकेश को हिरासत में लिया गया है।

राकेश का कहना है कि शहर के किसी भी थाने में उनके खिलाफ कोई मुकदमा दर्ज नहीं है। कभी शांतिभंग तक की कोई कार्रवाई नहीं हुई और कुछ लोगों के षड्यंत्र के चलते उन्हें झूठे मुकदमे में फंसाने की साजिश रची गई। उन्होंने बताया कि पूछताछ के लिए विवेचक ने पहले कभी उन्हें नहीं बुलाया था।

बेगुनाही साबित करने के लिए दिया जवाब

बार एसोसिएशन के पूर्व महामंत्री राकेश तिवारी को हिरासत में लेकर पुलिस ने नौ घंटे तक पूछताछ की। पुलिस के हर सवाल का राकेश ने जवाब दिया। राजाराम वर्मा की हत्या, उनकी बहू के साथ किए गए जमीन के सौदे, राजाराम के बेटे नरेंद्र से उनके संबंधों और राकेश के ड्राइवर की पत्नी द्वारा लगाए गए आरोपों के संबंध में पुलिस ने तरह-तरह से सवाल पूछे। राकेश ने अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए जहां पुलिस के सामने अपना पक्ष रखा वहीं पुलिस को कई अन्य बिंदुओं पर विवेचना करने की बात भी कही।

मेरे सामने लिखी गई थी तहरीर

पूर्व महामंत्री राकेश तिवारी ने बताया कि अधिवक्ता राजाराम वर्मा की हत्या के समय वह बार एसोसिएशन के महामंत्री थे।उनकी हत्या की सूचना पर तत्कालीन अध्यक्ष बलजीत यादव व उपाध्यक्ष अजय शर्मा के साथ रीजेंसी अस्पताल पहुंचे। पुलिस को खबर की। पोस्टमार्टम हाउस भी गए। बताया कि उन्हीं के सामने राजाराम के बेटे ने तहरीर भी लिखी फिर वह थाने चला गया। पुलिस ने अपराधियों को गिरफ्तार कर घटना का खुलासा भी कर दिया था।

रुपये न होने की वजह से निरस्त कराए एग्रीमेंट

राजाराम के सौतेले भाई राज बहादुर ने मेरे मित्र नवीन मिश्रा से राजाराम की बहू द्वारा जमीन बेचे जाने की बात कही। लगभग 12 बीघा जमीन का छह करोड़ 80 लाख रुपये में सौदा तय हुआ। दो करोड़ 75 लाख रुपये भुगतान करके चार एग्रीमेंट कराए गए। तय हुआ था कि परिवार के मुकदमे खत्म कराने के बाद रजिस्ट्री होगी। मुकदमे खत्म कराने के बाद रजिस्ट्री कराने के लिए कहा गया लेकिन उस समय मेरे पास रुपयों की व्यवस्था नहीं थी जिस पर मैंने 15 बिस्वा की रजिस्ट्री करवा ली और बाकी एग्रीमेंट निरस्त करवा दिए जिसकी रकम मुझे वापस मिल गई।

नरेंद्र अपने मुकदमों की मुझसे करवाता था पैरवी

नरेंद्र देव के अधिवक्ता धीरज सैनी थे लेकिन मैं उनके मुकदमों में पैरवी करता था। नरेंद्र मुकदमा जीत गए तो अपील दाखिल हुई। उसमें भी मैंने पैरवी की। नरेंद्र की भाभी ने मारपीट की रिपोर्ट दर्ज कराई थी जिसमें नरेंद्र को जेल भी जाना पड़ा था। नरेंद्र खुद मुझे जेसीपी के पास भी ले गए थे। उन्होंने शासन से जांच आने की बात कही तो मैंने कहा था कि सभी मामलों की एकसाथ जांच करवा लीजिए। अगर मैं पिता की हत्या में शामिल था तो बेटा मुझसे पैरवी क्यों करवाता था। पहले दिए प्रार्थना पत्रों में उसने मुझ पर कोई आरोप नहीं लगाया था लेकिन दोबारा किसके दबाव में प्रार्थना पत्र दिया, इसकी जांच होनी चाहिए।



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