दहेज की कुप्रथा ने एक साल में 31 बेटियों की जान ले ली। किसी की चीखें कमरे से बाहर आईं तो किसी ने खामोशी से मौत को गले लगा लिया। चौंकाने वाली बात यह है कि इन मौतों में पढ़ी-लिखी बेटियां हैं और उनकी शादी सभ्य परिवारों में हुई थी। कुछ ऐसी भी बेटियां हैं जिन्होंने समय रहते दहेज लोभियों को पहचान लिया, नहीं तो उन्हें भी प्रताड़ना झेलनी पड़ती। दहेज प्रताड़ना के कई मामले पंचायतों के बीच उलझे हुए हैं और उनका हल नहीं निकल पाया।
कमिश्नरेट पुलिस ने एक साल में दहेज उत्पीड़न के 533 मामले दर्ज किए हैं। ज्यादातर मामले शादी के शुरुआती वर्षों के हैं, खासकर एक साल के अंदर के। इन मामलों में कार, फ्लैट और पति के अवैध संबंध भी सामने आए। जो महिलाएं यह प्रताड़ना नहीं सह पाईं, उन्होंने जान दे दी।
जिन महिलाओं ने इसका विरोध किया, वे या तो मायके में हैं या उनका मामला न्यायालय में है। जान देने से पहले कई पीड़िताओं ने मायके में अपनी हालत बताई थी, लेकिन सामाजिक बदनामी और रिश्तों के टूटने के डर से समय रहते शिकायत नहीं की गई।
