सत्ता परिवर्तन की वजह से भारत के साथ बांग्लादेश के रिश्ते असहज हो गए हैं लेकिन वर्ष 1971 में जब बांग्लादेश मुक्ति संग्राम निर्णायक मोड़ पर था, तब भारत ने नए राष्ट्र के जन्म में अहम भूमिका निभाई। बुंदेलखंड के सैकड़ों सैनिकों ने भी पूर्वी मोर्चे पर दुश्मन से लोहा लिया था। कई जवानों ने सीमा पार अभियान में हिस्सा लिया तो कई ने रसद, संचार और रणनीतिक मोर्चों पर निर्णायक भूमिका निभाई। उस दौर में ढाका की सड़कों पर भारतीय सैनिकों का फूलों से जोरदार स्वागत हुआ था। अमर उजाला ने 17 दिसंबर 1971 के अंक में ढाका में भारतीय जवानों का भाव-भीना मार्मिक स्वागत शीर्षक से खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया था।
कर्फ्यू के बावजूद सड़कों पर थी भारी भीड़
बता दें कि भारत में 16 दिसंबर को विजय दिवस 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारत की ऐतिहासिक जीत और बांग्लादेश के गठन की स्मृति में मनाया जाता है। तब ढाका में पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सेना और मित्र वाहिनी के सामने आत्मसमर्पण किया था। अमर उजाला में प्रकाशित खबरों के मुताबिक 16 दिसंबर को नई दिल्ली से करीब 1600 किलोमीटर दूर ढाका में मुक्ति दिवस मनाया गया था। ढाका में उस दिन अपराह्न 1:30 बजे खुशियों के सैलाब के बीच भारतीय सेना को लेकर एक जीप घुसी तब अथाह फूल बरसाए गए। कर्फ्यू के बावजूद सड़कों पर भारी भीड़ थी। बंगालियों को जहां कहीं भारतीय सैनिक दिख जाते वे गगनभेदी नारों के साथ हर्ष से चीख पड़ते थे। तब मुक्ति की प्रेरणा देने वाले शेख मुजीब पश्चिमी पाकिस्तान की किसी जेल में बंद थे। आजादी के 54 साल बाद अब तस्वीर बिल्कुल उलट हो गई है। शेख मुजीब की बेटी बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और कई मामलों में सजायाफ्ता शेख हसीना भारत में एक साल से अधिक समय से निर्वासित जिंदगी जी रही हैं। आज जब देश विजय दिवस मना रहा है, तब बुंदेलखंड के लिए यह दिन गौरव, बलिदान और स्मृति का भी है। यह याद दिलाता है कि ढाका की जीत सिर्फ सीमाओं पर नहीं, बल्कि बुंदेले जांबाजोंं के हौसले से भी संभव हुई, जिनकी गूंज इस धरती में बसती है।