हाथ में प्राइवेट डॉक्टर की पर्ची और फोन पर बात करते हुए सीधे डॉक्टर के कमरे में घुसा युवक कहता है कि नेता जी से बात कर लीजिए। डॉक्टर ने पूछा, कौन है? मैं क्यूं बात करूं? युवक ने कहा-नेता जी लखनऊ में हैं, नाराज हो जाएंगे। यह सुन डॉक्टर ने फोन लिया और जी सर..जी सर…जी सर बोलते हुए फोन काट दिया। इसके बाद युवक ने अपने हाथ में रखी दो पर्चियों को आगे बढ़ाया। इनमें से एक पर्ची अलीगढ़ शहर के चर्चित प्राइवेट अस्पताल की है, जिस पर वहां के डॉक्टर ने 72 तरह की रक्त जांच की सलाह लिखी है और दूसरी पर्ची डीडीयू अस्पताल की है जो एक रुपये में बनती है। युवक ने कहा कि प्राइवेट डॉक्टर ने जो जांच लिखी है, उसे सरकारी पर्ची पर लिख दो। डॉक्टर ने कागज देखे और बिना कुछ कहे सभी जांच करवाने की सलाह लिख दी। इसके बाद दोनों पर्चियों को लेकर युवक जांच काउंटर पर पहुंचा और नमूना देकर चला गया।

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यह पूरा घटनाक्रम ”अमर उजाला” के रिपोर्टर के सामने हुआ। जब इसकी पड़ताल की तो पता चला कि ऐसे रोजाना 50 से 60 मरीज हैं जो वीआईपी संपर्क से अस्पताल आते हैं और कई तरह की रक्त जांच करवाते हैं। सरकारी डॉक्टर स्वयं सरेंडर हो जाते हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान अस्पताल के संसाधनों पर पड़ रहा है। एक तरफ जरूरी मरीजों को समय रहते जांच का अभाव है दूसरी ओर फिजूल जांच वाले नमूनों का प्रयोगशाला में दबाव बढ़ता जा रहा है। केवल दो तकनीशियन 400 से ज्यादा नमूनों की प्रतिदिन जांच कर रहे हैं।


अस्पताल में जो भी जांच होती है, सरकारी पर्चे पर चिकित्सक के परामर्श के बाद की जाती है। रही बात दबाव और दुरुपयोग की तो जांच कराने आने वाले मरीजों को रोकना भी संभव नहीं है। डॉक्टरों को निर्देश देंगे कि बाहर की पर्चियों के हिसाब से अपनी पर्ची न बनाएं बल्कि प्रोटोकॉल का पालन करें।– डॉ. एमके माथुर, सीएमएस, डीडीयू अस्पताल


हम रोजाना 20 से 25 ऐसे मरीजों के लिए फुलबॉडी चेकअप की सलाह लिख रहे हैं जो प्राइवेट अस्पताल से रेफर होकर हमारे पास आते हैं। इसके अलावा, अस्पताल के अन्य डॉक्टर भी 20 से 25 फुलबॉडी चेकअप लिखते हैं।– डॉ. एसके सिंघल, कार्डियोलॉजिस्ट, डीडीयू अस्पताल



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