जब ईश्वर के प्रति सच्ची श्रद्धा हो और मन में भक्ति का संकल्प तो कोई भी बाधा रास्ते में आड़े नहीं आती। इसका उदाहरण मथुरा की तहसील महावन के गांव आंगई दाऊजी निवासी शिवभक्त दिव्यांग धीरेंद्र सिकरवार हैं। दोनों पैर न होने के बाद भी वह राजघाट से मथुरा तक कांवड़ लेकर जा रहे हैं। गले में गंगाजल की दो कट्टी लटकाए धीरेंद्र को जो देखता है वह नमन ही करता है।

कांवड़िया धीरेंद्र आंगई निवासी किसान सत्यवीर सिंह के चार बेटे एक बेटी में दूसरे नंबर के धीरेंद्र जन्म से ही दिव्यांग हैं। उनके बड़े भाई जितेंद्र सिकरवार दिल्ली में इंजीनियर हैं। धीरेंद्र ने बताया कि वह बल्देव पब्लिक स्कूल में हाईस्कूल तक पढ़े हैं। दिव्यांग होने के कारण वह घर से पांच किमी दूर बस से स्कूल पढ़ने जाते थे। माता-पिता और भाई-बहन उनकाे हमेशा सहयोग करते हैं। वह अकेले ही बिना किसी अन्य व्यक्ति के सहारे कांवड़ लेने निकले हैं। वह अविवाहित हैं। वह बस द्वारा रामघाट पहुंचे और वहां स्नान कर बुधवार को रामघाट से चले थे। बृहस्पतिवार को अतरौली पहुंचे।

एक दिन में तय करते हैं 14 किलोमीटर सफर

उन्होंने बताया कि वह एक दिन में करीब 20-24 किलोमीटर का सफर तय कर लेते हैं। रास्ते में जहां भी मंदिर पड़ता है, वहां कांवड़ की कट्टियों को टांगकर रात्रि विश्राम करते हैं। खाने में हल्का खाना जो भी मिल जाए खाते हैं।

पहले भी दो लीटर की कांवड़ ले जा चुके हैं

धीरेंद्र ने बताया कि वह पिछले वर्ष दो लीटर जल लेकर गए थे। इस बार चार लीटर जल लेकर चल रहे हैं। उन्होंने कहा कि भगवान की प्रति उनकी आस्था है। ईश्वर की भक्ति के लिए परिवार के सदस्य भी उनका सहयोग करते हैं। समाजसेवी मंगल गुप्ता, भुवेंद्र उपाध्याय, दुष्यंत आदि कहते हैं कि इस तरह के भक्तों के जज्बे को देखकर हर कोई बेहद प्रभावित हो रहा है।



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