सुना है क्या में… आज पढ़िए सियासी गलियारों के किस्से। एक बड़े दल के मुखिया ने उपथपुथल को भांपते हुए पहले ही दांव चल दिया और कई लोगों के मंसूबों पर पानी फेर दिया। वहीं, यूपी के एक माननीय ने दिल्लीवाले माननीय को उनकी सियासी क्षमता दिखा दी। इसके अलावा, किसका एक माननीय पुत्र का भी जिनका जमकर सिक्का चल रहा है।

इरादे भांप लिए…

एक राजनीतिक दल में कुछ उथल-पुथल चल रही है। यही वजह है कि दल के मुखिया ने किलेबंदी को मजबूत करने की चाल चलकर गड़बड़ी फैलाने की कोशिश करने वालों के मंसूबों पर पानी फेर दिया। भितरघात करने वालों के इरादे भांपकर खुद की सेहत ठीक होने और एकमात्र उत्तराधिकारी होने का दावा करते हुए पार्टी पर अपनी मजबूत पकड़ सार्वजनिक कर दी। चर्चा है कि भितरघात करने वालों को भी चिह्नित कर लिया गया है। उन्हें जल्द बाहर का रास्ता दिखाने की तैयारी है। वैसे भी पार्टी में पुरानी रवायत है कि जो ज्यादा पंख फैला रहा हो, उसे किनारे कर दो।

हाजिर जवाब माननीय

संविधानिक पद पर विराजमान दिल्ली के एक माननीय यूपी के माननीयों से रूबरू हो रहे थे। इस दौरान उन्होंने एक विपक्षी माननीय से पूछ लिया कि पहली बार वे संविधानिक पद पर कब बैठे? विपक्षी माननीय भी बड़े हाजिर जवाब हैं। बोल दिया, 2003 में संविधानिक पद पर बैठ गया था। साथ ही जोड़ दिया कि तब आपका (दिल्ली के माननीय का) राजनीति में अता-पता भी न होगा। इशारों ही इशारों में उन्होंने अपने राजनीतिक अनुभव के सामने दिल्ली के माननीय की स्थिति बता दी। उनकी यह हाजिर जवाबी राजनीतिक गलियारों में इन दिनों खूब चर्चा में है।

माननीय पुत्र का कारोबार

बुंदेलखंड का प्रवेश द्वार कहे जाने वाले जिले में एक माननीय के शिक्षक पुत्र के कभी न स्कूल जाने की चर्चा थमी भी नहीं थी कि उनके करीबी की फर्म पर फर्जी भुगतान कराने का मामला गरमा गया है। माननीय पुत्र बेसिक शिक्षक हैं लेकिन पिता के सत्ताधारी दल का माननीय होने की धौंस के चलते वह महीने में एक बार हस्ताक्षर करने स्कूल जाते हैं। वह ब्लाकों से मनरेगा मद से फर्जी भुगतान कराने में ही व्यस्त रहते हैं। ताजा मामला जिले के नदी के गांव वाले क्षेत्र के एक ग्राम प्रधान की शिकायत से जुड़ा है। इसमें प्रधान ने उसका फर्जी हस्ताक्षर बनाकर माननीय पुत्र पर एक करीबी के नाम से बनी फर्म को भुगतान कराने की बात कही है। प्रधान ने शासन, प्रशासन से लेकर कोर्ट तक में शिकायत कर दी है। अब देखना यह है कि माननीय का रसूख भारी पड़ता है या कायदा-कानून।

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