बुंदेलखंड में सौर ऊर्जा के जरिए बदलाव हो रहा है। जिन गांवों में अभी तक बिजली नहीं थी, वहं सौर ऊर्जा से खेतों में सब्जी की फसलें लहलहा रही हैं। बिना बिजली के आटा चक्की, स्पेलर सहित अन्य लघु उद्योग चल रहे हैं। सोलर का चलन बढ़ा तो युवाओं के लिए रोजगार के नए द्वार खुल गए हैं।
बांदा शहर में स्टेशन रोड से आगे बढ़ते ही सोलर प्लेट की दुकानें दिखती हैं। यहां मिले अमित सिंह। वह पहले गुड़गांव थे। एक कंपनी में काम करते थे। दो साल पहले गांव लौटे। यहीं सोलर प्लेट की दुकान खोल ली। उनके साथ पांच अन्य युवा भी जुड़े हैं। वे सोलर मित्र का प्रशिक्षण ले चुके हैं। ये सोलर प्लेट खरीदने वालों के घर जाते हैं। उसे लगाने से लेकर मरम्मत तक की जिम्मेदारी निभाते हैं।
महोबा- झांसी मार्ग हो अथवा कालपी रोड। हर हाईवे पर जगह- जगह सोलर मरम्मत का बोर्ड लगा है। महोबा में मिले दिनेश लोधी सोलर प्लांट में चौकीदारी करते थे। प्लेट लगाने से लेकर वायरिंग तक का अनुभव लिया। अब टेक्नीशियन बन गए हैं।
वे प्लेट लगाने और बैटरी बदलने का काम करते हैं। बताते हैं कि खेतों में लगे सोलर लगे हैं। कभी बंदर तो कभी जानवर उसे तोड़ते हैं। ऐसे में लोगों को बनवाना पड़ता है। औसतन हर दिन पांच सौ से एक हजार रुपये की आमदनी हो जाती है। इतने से गुजारा हो जाता है।
हम चित्रकूट के बदरपुर गांव पहुंचे। खेत में सोलर पंप दिखा तो हकीकत जानने की कोशिश की। यहां मिले राम विशाल यादव। उनके पास छह बीघा खेत है। पहले अरहर और जौ की बुवाई करते थे। ज्यादातर वक्त खेत खाली रहता था। पीएम कुसुम योजना में सोलर लगवाया। अब सिर्फ सब्जी की खेती करते हैं।
हर साल करीब डेढ़ से दो लाख कमा लेते हैं। अपने खेत के साथ दूसरों के खेतों की सिंचाई करते हैं। इससे भी करीब 50 हजार की आमदनी होती है। वह बताते हैं कि तीन साल पहले सोलर लगवाने वाले इकलौते किसान थे। लोगों ने सोलर का फायदा देखा। आसपास के गांवों में दर्जनभर लोगों ने सोलर पंप लगवा लिया है। अब पूरा इलाका सब्जी की खेती कर रहा है।
