लखनऊ। साहित्य अकादमी दिल्ली की ओर से बाल दिवस पर गोमतीनगर के भागीदारी भवन में बाल साहित्य पुरस्कार-2024 अर्पण समारोह का आयोजन किया गया। देशभर से 24 भाषाओं के 24 बाल साहित्यकारों को पुरस्कृत किया गया। 625 निर्णायकों के पैनल ने लंबी प्रक्रिया के बाद इनका चुनाव किया। विभिन्न राज्यों से बाल रचनाकारों को सम्मानित किया गया लेकिन इतने बड़े राज्य यूपी से एक भी बाल रचनाकार नहीं निकला।
मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार सूर्य प्रसाद दीक्षित और अकादमी के अध्यक्ष माधव कौशिक व उपाध्यक्ष कुमुद शर्मा की मौजूदगी में रचनाकारों को सम्मानित किया गया। खास बात है कि लखनऊ में पहली बार साहित्य अकादमी के किसी पुरस्कार समारोह का आयोजन किया गया। मुख्य अतिथि प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित ने कहा कि बाल साहित्य रचने के लिए रचनाकारों को बाल मनोविज्ञान और भाषा विज्ञान को आत्मसात करना चाहिए। आज कार्यशालाओं और अन्य प्रयासों से बच्चों के साहित्य को पठनीय, श्रव्य और दृश्यव्य बनाने की जरूरत है।
समारोह की अध्यक्षता कर रहे अकादमी के अध्यक्ष माधव कौशिक ने कहा कि जो भी लिखने वाला अपनी कलम शुद्ध करना चाहता है तो उसे बाल साहित्य जरूर रचना चाहिए। एक ऐसा समय था जब बाल साहित्य लिखना बचकाना माना जाता था और हिंदी साहित्य दक्षिण भारतीय भाषाओं में भी बड़े रचनाकारों ने बाल साहित्य रचना छोड़ दिया था। खुशी है कि अब देश के अधिकांश राज्यों में बच्चों की अलग अकादमियां, पुरस्कार और योजनाएं चलाई जा रही हैं। प्रेरक बाल साहित्य लिखने को कठिन कार्य बताते हुए उन्होंने कहा कि अगर आतंकवादियों को बचपन में अच्छा साहित्य पढ़ने को मिलता तो वह आतंक नहीं, इंसानियत अपनाते।
पुरस्कृत रचनाकार, भाषा, कृति
रंजु हाजरिका (असमिया) – बिपन्न बिस्मय खेल
दीपान्विता राय (बांग्ला) – महीदादुर एंटिडोट
भार्जिन जेक’ भा मोसाहारी (बोडो) – बुहुमा बयनिबो
बिशन सिंह ‘दर्दी’ (डोगरी) – कुक्कडू-कडूं
नंदिनी सेनगुप्ता (अंग्रेजी) – द ब्लू हाॅर्स एंड अदर अमेजिंग एनिमल्स फ्रॉम इंडियन हिस्ट्री
गिरा पिनाकिन भट्ट (गुजराती) – हंसती हवेली
देवेंद्र कुमार (हिंदी) – इक्यावन बाल कहानियां
कृष्णमूर्ति बिल्लिगेरे (कन्नड़) – छूमंत्र्य्याना कथेगलु
मुजफ्फर हुसैन दिलबर (कश्मीरी) – सोन गोब्रेयो
हर्षा सद्गुरु शेटये (कोंकणी) – एक आशिल्लें बायूल
नारायणजी (मैथिली) – अनार
उन्नी अम्मायंबल्लम (मलयालम) – अल्गोरिथांगालुडे नाडु
क्षेत्रिमयुम सुवदनी (मणिपुरी) – मालेम अतिया
भारत सासणे (मराठी) – समशेर आणि भूतबंगला
वसंत थापा (नेपाली) – देश र फुच्चे
मानस रंजन सामल (ओड़िया) – गप कलिका
कुलदीप सिंह दीप (पंजाबी) – मैं जल्लिआंवाला बाग बोल्दा हां
प्रहलाद सिंह ‘झोरड़ा’ (राजस्थानी) – म्हारी ढाणी
हर्षदेव माधव (संस्कृत) – बुभुक्षित: काक:
दुगाई टुडू (संताली) – मिरु आड़ाड
लाल होतचंदानी ‘लाचार’ (सिंधी) – दोस्तन जी दोस्ती
युमा वासुकि (तमिल) – दन्वियिन पिरन्दनाल
पामिदिमुक्कला चंद्रशेखर आजाद (तेलुगु) – माया लोकम
शम्सुल इस्लाम फारूकी (उर्दू) – बर्फ का देस अंटार्कटिका
अब गांव मेें बैठे साहित्यकारों को भी आसानी
साहित्य अकादमी से सचिव डॉ. के श्रीनिवास राव ने बताया कि पहले ये पुरस्कार ऑफलाइन माध्यम से 24 भाषाओं के विद्वान गोपनीय तरीके से करते थे। लेकिन अब दूरदराज गांव में बैठे रचनाकार भी बाल साहित्यकार पुरस्कार से जुड़ सकते हैं। अब समाचार पत्रों में विज्ञापन के जरिए व ऑनलाइन माध्यमों से साहित्यकारों से सीधे जुड़ा जाता है। उन्होंने कहा कि 70 साल में साहित्य अकादमी ने लखनऊ में एक भी पुरस्कार समारोह का आयोजन नहीं किया था। यह हमारा सपना भी था कि सांस्कृतिक व विद्वानों की नगरी लखनऊ में साहित्य अकादमी के पुरस्कार समारोह का आयोजन किया जाए। बाल साहित्य पुरस्कार 2010 में शुरू किए गए थे। यह 14वां आयोजन रहा।
रात में बिना लिखे नींद नहीं आती
असम से रंजु हाजरिका ने बताया कि वह अब तक करीब 750 रचनाएं लिख चुके हैं। उनकी कई सरकारी नौकरियां भी लगीं लेकिन सभी को छोड़ दिया। लिखने का शौक इतना हावी हो गया कि वह खुद को रोक नहीं पाते हैं। बताया कि उनकी पहली जेसन सीरीज बेहद पसंद की गई। उसके बाद पवन और फिर उनकी सीरीज का कारवां बढ़ चला। कहते हैं कि अब बिना कुछ लिखे उन्हें नींद ही नहीं आती।
सकारात्मकता बांटने के लिए लिखने लगीं
कोलकाता की दीपान्विता राय ने बताया कि वह पेशे से पत्रकार हैं। उनकी शुरुआत से ही पढ़ने की आदत रही है। 2008 में उनकी चुप रहो कहानी सुनो… रचना काफी चर्चा में आई और वह लिखते-लिखते यहां तक आ गईं। वह अब तक 60 से अधिक रचनाएं लिख चुकी हैं। बताया कि पत्रकारिता में हमारे सामने बहुत कुछ घटित होता है। सब कुछ बताया या दिखाया नहीं जाता, उसी में से बहुत कुछ जनता को बताने या सिखाने के लिए अलग से लिखना शुरू कर दिया।
रहती है बच्चों के भविष्य की चिंता
महाराष्ट्र से भारत सासणे ने बताया कि वह रिटायर्ड आईएएस हैं। उन्हें बच्चों के भविष्य की चिंता रहती है जिसके लिए वह बाल साहित्य पर लिखने लगे। कहा कि वह 62 किताबें लिख चुके हैं। बच्चों को आजकल तकनीकी ज्ञान परोसा जा रहा है लेकिन उनको रोमांच व अद्भुत रस नहीं दिया जा रहा है जो कि गंभीर विषय है।
ये साहित्यकार नहीं आ सके
अंग्रेजी भाषा में पुरस्कार पाने वाली नंदिनी सेनगुप्ता समारोह में नहीं पहुंच सकीं। उनका पुरस्कार उनके प्रकाशक ने ग्रहण किया। इसके अलावा दिल्ली के देवेंद्र कुमार (हिंदी), दिल्ली के ही शम्सुल इस्लाम फारुकी (उर्दू) और गांधी धाम गुजरात के लाल होतचंदानी लाचार समारोह में अनुपस्थित रहे।
