
कारसेवक निशेंद्र मोहन मिश्र की जुबानी
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राममंदिर आंदोलन श्रीराम के प्रति अगाध आस्था का भी परिचायक था। राममंदिर की मुक्ति के लिए रामभक्त कुछ भी कर गुजरने को तैयार थे। मैं उन दिनों मंदिर आंदोलन के महानायक रामचंद्र दास परमहंस के सानिध्य में रहता था। हर आंदोलन में परमहंस ही नेतृत्व करते थे। मंदिर आंदोलन का प्रमुख केंद्र दिगंबर अखाड़ा होता था, यहीं से रणनीतियां बनती थीं। दो नवंबर का गोलीकांड आज भी नहीं भूलता है।
कारसेवकों पर लाठियां बरसाने से लेकर गोली कांड तक की घटना आज भी जब आंखों के सामने तैरती है तो शरीर कांप उठता है। 30 अक्तूबर 1990 को कारसेवकों को हटाने के लिए सुरक्षाकर्मियों ने आंसू गैस के गोले छोड़े थे। रामभक्तों का जुनून इस कदर था कि उन्होंने इसकी भी काट निकाल ली। वह अपने चेहरे पर पानी से भिगोये कपड़े बांध लेते थे, जिससे गैस का असर ही नहीं होता था। इसके लिए लोगों ने घरों में नए-पुराने कपड़े फाड़कर, काटकर रखे थे, ताकि कारसेवकों को दिया जा सकें।
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कारसेवकों के लिए दिगंबर अखाड़ा में महंत रामचंद्र दास परमहंस की ओर से भोजन व नाश्ते की भी व्यवस्था की जाती थी। इन व्यवस्थाओं का संचालन भी महाराज जी ने मुझे ही दे रखा था। एक घटना याद आती है बहराइच से कुछ कारसेवक आए थे। दिगंबर अखाड़ा में भोजन कर रहे थे। किसी ने कहा कि पुलिस गोलियां बरसा सकती है, यहां से वापस हो जाना चाहिए। इस पर उन कारसेवकों ने कहा कि राम के नाम पर जान भी चली जाए तो कम नहीं, लेकिन अब वापस नहीं जाएंगे। कारसेवक मंदिर के लिए मरने-मिटने को तैयार थे।
