मथुरा के  महिला अस्पताल में मिर्गी के दौरे से पीड़ित बच्चों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। प्रतिदिन अस्पताल में 5 से 7 बच्चे मिर्गी के दौरे के बाद उपचार के लिए पहुंच रहे हैं। बच्चों की बढ़ रही संख्या के कारण स्वास्थ्य अधिकारी भी गंभीर हो गए हैं। अस्पताल में इन बच्चों का इलाज किया जा रहा है, साथ ही उनका रिकॉर्ड भी रखा जा रहा है ताकि उनकी निगरानी बेहतर तरीके से की जा सके।

महिला अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. ओमप्रकाश ने बताया कि रोजाना औसतन 5 से 7 बच्चे इस बीमारी से पीड़ित आ रहे हैं। परिजन सही समय पर इलाज नहीं कराते हैं, इसलिए यह बीमारी भयानक रूप लेती जा रही है। उन्होंने बताया कि नवजातों में मिर्गी की बीमारी होने के कई कारण हो सकते हैं। आमतौर पर बच्चा पैदा होने के बाद देरी से रोए तो उसे दौरा पड़ने की समस्या हो सकती है।

इसके अलावा जन्म के समय ऑक्सीजन की कमी, प्रसव के दौरान सिर में चोट या रक्तस्राव, संक्रमण या कोई जन्मजात रोग नवजातों में दौरे का मुख्य कारण बनते हैं। परिजन को इसकी जानकारी तीन, छह और नौ माह के अंदर हो जाती है, लेकिन माता-पिता शुरुआती लक्षणों को पहचान नहीं पाते हैं। उन्होंने बताया कि नवजात शिशुओं में दौरे की समस्या गंभीर है। शुरुआती लक्षण पहचान कर समय पर इलाज कराने से बच्चे को सामान्य जीवन दिया जा सकता है।

बच्चे को दौरा पड़ने पर इस तरह पहचानें माता-पिता

सामान्य बच्चा तीन महीने के अंदर अपनी गर्दन संभालने लगता है, छह माह के अंदर वह अपने आप करवट बदल लेता है। वहीं यदि बच्चा मिर्गी की बीमारी से पीड़ित है तो वह अपनी गर्दन को संभाल नहीं पाता। दौरा पड़ने पर गर्दन टेढ़ी हो जाती है, आंखे ऊपर चढ़ जाती है, मुंह से लार निकलने लगती है। बच्चा लगातार एक ही दिशा में घूरता रहता है और उसके व्यवहार में अचानक परिवर्तन हो जाता है। अक्सर सुबह उठते समय या कभी-कभी नींद के दौरान भी इस तरह की हरकत बच्चा करता है।



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