
Ayodhya Ram Mandir
– फोटो : एक्स से ली गई तस्वीरें
श्रीराम सबके हैं, यह बात भारतवर्ष ही नहीं, पूरा विश्व समझने लगा है। श्रीराम ने जगत के प्राणियों को अपना माना तो उनकी समस्याओं का निवारण और उद्धार भी किया। श्रीराम के वनगमन में केवट का प्रसंग बहुत कुछ कहता है। भोईवंश से संबंध रखने वाले केवट मल्लाह हैं और नैया खेने का काम करते हैं।
केवट श्रीराम की अवज्ञा भी करते हैं तो भी वे मुस्काते हैं। केवट मनमानी पर अटल हैं, तो प्रभु करने देते हैं और अंत में उन्हें आशीर्वाद भी दे जाते हैं। कारण था-केवट का भक्ति भाव। प्रभु श्रीराम को गंगा पार जाना था तो कहा-भाई, नैया यहां लाओ, गंगा पार जाना है। केवट ने आज्ञा का पालन नहीं किया, बल्कि सहज भाव में बोले-मैंने आपका भेद जान लिया।
सब कहते हैं, आपके चरणों की रज मनुष्य बना देने वाली है, जिसके छूते ही पत्थर की शिला सुंदर स्त्री बन गई। मेरी नैया तो काठ की है। श्री रामचरितमानस के अयोध्याकांड में लिखा है-
मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना॥
चरन कमल रज कहुं सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई॥
केवट उसी सरलता से आगे कहते हैं-हे नाथ! मैं चरण कमल धोकर आपको नाव पर चढ़ा लूंगा। कुछ उतराई नहीं चाहता। लक्ष्मण जी भले ही तीर मारें, पर जब तक पैरों को पखार न लूं, तब तक हे कृपालु! मैं पार नहीं उतारूंगा। केवट के लिए भगवान की सेवा परमधाम है। इसीलिए सेवा का यह अवसर गंवाना नहीं चाहते, तो काठ की नैया की बात कह दी।
