एक जिला एक उत्पाद योजना में वुड प्रोडक्ट (फर्नीचर, प्लाईवुड) को शामिल किए जाने से बरेली के फर्नीचर को वैश्विक पहचान मिलेगी। उद्यमियों ने कुशल कामगारों की कमी, उत्पादन के सापेक्ष कच्चे माल की अनुपलब्धता सहित अन्य अड़चन दूर होने पर सालाना कारोबार सौ करोड़ से बढ़कर दो हजार करोड़ पहुंचने का अनुमान जताया है।
बरेली की जरी-जरदोजी, बांस-बेत के उत्पादों की मांग दुनियाभर में हैं। यहां के वुडेन फर्नीचर की भी अलग पहचान है। सिकलापुर में करीब सौ वर्षों से फर्नीचर का कारोबार हो रहा है। कुमार टॉकिज, शाहदाना समेत जिले में बड़े पैमाने पर फर्नीचर का काम होता है।
शहर में ही करीब 12 हजार कामगार फर्नीचर तराश रहे हैं। समय के साथ डिजाइन, काम के तरीके में बदलाव आया है, पर आज भी करीब 80 फीसदी कार्य हाथों से होता है। यहां के कारीगर मनचाही डिजाइन में फर्नीचर बनाने में दक्ष हैं। दिल्ली, उत्तराखंड, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, बिहार, महाराष्ट्र, गुजरात समेत अन्य राज्यों में बरेली के फर्नीचर की जबर्दस्त मांग है।
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यहां के रॉकिंग चेयर की देशभर में मांग
फर्नीचर कारोबारियों के मुताबिक, बरेली में तैयार रॉकिंग चेयर पर वर्ष 2007 में एक फिल्म स्वामी बन चुकी है। इसमें इस कुर्सी को खरीदने के लिए एक व्यक्ति का संघर्ष दर्शाया गया है। गौरव गर्ग के मुताबिक, शीशम से बनी कुर्सी का आकार आधे चांद जैसा होता है। हाथ की बारीक नक्काशी से इसे आकार मिलता है। यह देखने में भारी लगती है, पर होती हल्की है। यह कुर्सी घर में हो तो रईसी का अहसास कराती है।