
ऐसे होती है बेरा जांच (प्रतीकात्मक)
– फोटो : amar ujala
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सरकारी बैंक में काम करने वाली दीप्ति को अपने कार्यालय में ब्रेन इवोक्ड रेस्पॉन्स ऑडियोमेट्री (बेरा) जांच के बाद रिपोर्ट दाखिल करनी है। इसमें उनकी सुनने की क्षमता जांची जानी है। इसके आधार पर ही यह तय होना है कि उनको ग्राहकों के साथ होने वाली लेन-देन की प्रक्रिया में शामिल करना है या नहीं। सीएमओ के पास आवेदन के बाद उनको डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान भेजा गया। यहां पर उनको जांच के लिए 8 मार्च 2027 को सुबह नौ बजे का स्लॉट मिला है।
दीप्ति ने पांच साल पहले बाराबंकी में पोस्टिंग के दौरान जांच कराई थी। बेरा जांच के प्रमाणपत्र की वैधता पांच साल ही होती है। एक महीने बाद उनके प्रमाणपत्र की वैधता समाप्त हो रही है। इसलिए उन्हें दोबारा जांच करानी है। पर, पांच साल की वेटिंग होने से उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि वह अपना प्रमाणपत्र कैसे जमा कर पाएंगी। दीप्ति ही नहीं, उनके जैसे आठ से दस मरीज रोज बेरा जांच के लिए लोहिया संस्थान पहुंचते हैं। जांच के लिए उनको लंबी तारीख दे दी जाती है।
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डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान में कान की जांच-बेरा की लंबी वेटिंग मरीजों के लिए मुसीबत है। जिन कर्मियों को अपने ऑफिस में इस जांच का प्रमाणपत्र देना है उनकी हालत और भी खराब है। बेरा जांच की सुविधा किसी सरकारी अस्पताल में नहीं है। चिकित्सा संस्थानों की बात करें तो केजीएमयू और लोहिया संस्थान में ही इसकी सुविधा है। निजी संस्थानों की जांच रिपोर्ट सरकारी विभाग नहीं मानते। ऐसे में मरीजों के पास कोई विकल्प नहीं है। लोहिया संस्थान के मीडिया प्रभारी प्रो. एपी जैन के अनुसार लंबी वेटिंग से उनको भी समस्या हो रही है, लेकिन जांच सेंटर कम होने और जांच में अधिक समय लगने की वजह से आगे की तारीख देना मजबूरी है।
इसलिए लगता है ज्यादा समय…
बेरा जांच में देरी के पीछे एक बड़ी वजह इसमें लगने वाला समय है। मरीज के अच्छी तरह से सोने के बाद ही यह जांच हो सकती है। सोते मरीज के कान के साथ ही सिर के विभिन्न हिस्सों में कैथोड लगाए जाते हैं। इनसे जो तरंगे पैदा होती हैं उनको कंप्यूटर के माध्यम से जांचा जाता है। पर, जरूरी नहीं कि मरीज आते ही तुरंत सो जाए। यह जांच नवजात बच्चों की सुनने की क्षमता जांचने के लिए खूब की जाती है। इसकी वजह से एक दिन में दो से तीन लोगों से ज्यादा की जांच नहीं हो पाती है। ऐसे में वेटिंग बढ़ती जाती है।
केजीएमयू में भी साल भर से ऊपर वेटिंग
बेरा जांच के लिए बहुत कम सेंटर होने से सारा दबाव केजीएमयू और लोहिया संस्थान पर है। केजीएमयू में भी इसकी वेटिंग साल भर से ऊपर है। लोहिया संस्थान की मीडिया सेल के अनुसार रोज ज्यादा से ज्यादा लोगों की जांच करने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन इसके सेंटर बढ़ाए बिना राहत नहीं मिल सकती है।
