{“_id”:”66b7bd23329a2780e903d194″,”slug”:”bundelkhands-historical-heritage-needs-tourism-and-development-orai-news-c-224-1-ka11004-118328-2024-08-11″,”type”:”story”,”status”:”publish”,”title_hn”:”Jalaun News: बुंदेलखंड की ऐतिहासिक धरोहरों को पर्यटन और विकास की जरूरत”,”category”:{“title”:”City & states”,”title_hn”:”शहर और राज्य”,”slug”:”city-and-states”}}

उरई/कुठौंद। बुंदेली शौर्य की गाथाएं और पौराणिक ऐतिहासिक धरोहरों की भरमार रखने वाले जालौन पर्यटक के दृष्टिकोण से खुद के संवारने का इंतजार कर रही हैं। पर्यटन की अपार संभावना समेटे जिले के अधिकतर पौराणिक धार्मिक स्थल अपने दिन बहुरने का इंतजार कर रहे हैं।

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आजादी के बाद से सरकारें बदली और वायदों की फेहरिस्त लंबी होती गई। लेकिन, पचनद क्षेत्र की पहचान कुछ साल पहले तक डकैतों चहलकदमी तक सीमित रही। बीते 48 सालों से पचनद को पर्यटन स्थल बनाने का काम सिर्फ कागजों में चल रहा है। जनपद के ऐतिहासिक किलों और प्राचीन धरोहरों पर पर्यटन विभाग की नजर पड़े तो टूरिस्ट हब बनने की अपार संभावनाएं समेटे यह क्षेत्र पर्यटन मानचित्र पर स्थापित हो जाएगा।

-पचनद क्षेत्र ने समेट रखी हैं ऐतिहासिक शौर्य की गाथाएं-

पुरातत्व धरोहरों में से एक रामपुरा किला स्थापत्य कला की अनुपम कृति है। यह चंबल के हरे भरे जंगल के बीच स्थित है। 600 साल पहले महाराज रामशाहि जूदेव ने बनवाया था किले में रियासत काल में उपयोग आने वाले हथियार भाला ढाल तरह-तरह की बंदूकों को संग्रहालय में रखा गया है। इसे बुंदेलखंड की रियासत का स्वर्ण मंदिर भी कहा जाता है वर्तमान में किले को होटल हेरिटेज का दर्जा प्राप्त है।

पांच नदियों के पास ही पर्यटन के अनेक स्थान

पचनद के पास ही करन खेड़ा का मंदिर इतिहास का साक्षी है। जब राजा विक्रमादित्य ने कर्णा देवी से अपने राज उज्जैन चलने के लिए कहा तो उन्होंने मना कर दिया तब माता ने राजा से कहा कि वह राजा कर्ण के लिए यहां पर आई थीं, इसलिए अन्य स्थान पर नहीं जाएंगे इससे क्रोधित होकर राजा विक्रमादित्य ने तलवार से मूर्ति पर प्रहार कर दिया, जिससे मूर्ति दो भागों में विभाजित हो गई राजा विक्रमादित्य ऊपरी हिस्से को अपने साथ उज्जैन ले गए और नीचे का धड़ पैरों की पूजा करन खेड़े मंदिर में की जाती है। बाकी ऐसे की पूजा उज्जैन के मंदिर में की जाती है।

यहां भी है महाकालेश्वर मंदिर

पांच नदियों के संगम के पास ऊंची नीची पहाड़ियों व दुर्गम रास्तों के बीच महाभारत कालीन महाकालेश्वर मंदिर मैं दर्शन कर सकते हैं। मान्यता है कि यही पांडवों ने चकरनगर में बकासुर दानव का संहार कर शरण ली थी। पश्चिम दिशा में संगम तट किनारे विशाल पीपल का पेड़ है कहा जाता है इसके नीचे बैठकर गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस के कुछ अंश लिखे थे।

444 फीट ऊंचाई पर बना चंबल का भारेश्वर मंदिर-

तीर्थ का भांजा कहे जाने वाले बटेश्वर से लेकर पजनद तक का क्षेत्र ईष्टापथ कहलाता है यमुना चंबल संगम पर स्थित भारेश्वर महादेव का प्राचीन काल से आध्यात्मिक ज्ञान एवं तपस्या का केंद्र रहा है मानता है कि विद्वान नीलकंठ ने कर्मकांड एवं दंड के 12 मयूक (ग्रंथ) एवं आयुर्वेदिक ग्रंथ इसी मंदिर में रहकर लिखा था आगरा से जाते समय महात्मा तुलसीदास भी इस मंदिर में कुछ समय रुके। मंदिर के महंत चंबल गिरी महाराज ने बताया भारेश्वर मंदिर के संबंध में लोगों को कहना है कि मंदिर का निर्माण राजस्थान की व्यापारी ने मनोकामना पूर्ण होने के बाद कराया था यह बात उसे समय की है जब सड़क मार्ग नहीं था और नदियों से व्यापारी अपना माल इधर से उधर पहुंचते थे व्यवसाय मदनलाल नाव से माल लेकर कानपुर की ओर जा रहे थे तभी यमुना व चंबल के भवन में उनकी नाव फस गई थी इस पर व्यापारी ने भारेश्वर महादेव महादेव को याद किया तो नव सुरक्षित निकल आई कानपुर से लौट के बाद व्यापारी मदनलाल ने इस भव्य मंदिर का निर्माण कराया।

औरंगज़ेब मंदिर पर कर चुका है आक्रमण-

भरेह का ऐतिहासिक भारेश्वर मंदिर पर और औरंगजेब ने आक्रमण किया था ऐसे मंदिर को काफी क्षति भी पहुंची थी क्षेत्र के लोग बताते हैं औरंगजेब के आक्रमण के निशान आज भी मंदिर पर नजर आते हैं बाद में मराठा शासक में इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। जानकार बताते हैं शिवलिंग दो प्रकार के होते हैं एक भार को हरण करने वाला दूसरा मुक्ति देने वाला होता है भगवान भारेश्वर महादेव भार को हरण करते हैं मंदिर से नदियों का दृश्य सुहाना लगता है ऐसा नजारा बहुत ही कम जगह पर देखने को मिलता है। यहां सावन ओर शिवरात्रि मैं आस्था का सैलाब उमड़ता है।

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