
चातुर्मास
– फोटो : Amar Ujala
विस्तार
चातुर्मास यानी वह अवधि जब भगवान विष्णु चार महीने की योग निद्रा में चले जाते हैं। चातुर्मास का आरंभ 17 जुलाई से होगा। इस दौरान शादी, ब्याह, मुंडन और गृह प्रवेश जैसे सभी शुभ कार्य पर रोक रहती है और पूजापाठ और दानपुण्य के कार्य करने का विशेष महत्व होता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, 17 जुलाई को देवशयनी एकादशी के दिन से चातुर्मास का आरंभ होता है और इस दिन से भगवान विष्णु क्षीर सागर में चार महीने के लिए सोने चले जाते हैं। उसके बाद 12 नवंबर को देवउठनी एकादशी के दिन से भगवान विष्णु और सभी देवतागण जागृत होकर अपना-अपना कार्य संभालते हैं। इस अवधि में सृष्टि का कार्यभार भगवान शिव संभालते हैं। इसलिए सावन के महीने में शिवजी की पूजा करने का खास महत्व होता है।
चातुर्मास में दान पुण्य करने का महत्व
आचार्य प्रवीण शर्मा बताते हैं कि चातुर्मास में जरूरतमंद लोगों को दान करने का विशेष महत्व पद्म पुराण में बताया गया है। इन चार महीने के दौरान चप्पल, छाता, कपड़े, अन्न-धन और पूजा की सामग्री का दान करना चाहिए। माना जाता है कि इस दौरान दान धर्म करने वालों से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और आपके घर में किसी प्रकार की धन की कमी नहीं होने देती हैं।
चातुर्मास में न करें ये काम
चातुर्मास के दौरान विवाह समारोह, सगाई, मुंडन, बच्चे का नामकरण, गृहप्रवेश सहित मांगलिक कार्य की मनाही है।
संयमित जीवन जीने का अभ्यास
शहद, मूली, परवल, बैंगन और साग का सेवन नहीं करना चाहिए।
