CM Yogi Adityanath on Hindu gaurav Diwas.

कल्याण सिंह ‘बाबूजी’ की तृतीय पुण्यतिथि पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ।
– फोटो : amar ujala

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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बुधवार को स्व. कल्याण सिंह की तृतीय पुण्यतिथि पर आयोजित ‘हिंदू गौरव दिवस’ के दूसरे संस्करण के कार्यक्रम में सम्मिलित हुए। इस दौरान मुख्यमंत्री ने प्रदेश की जनता की ओर से बाबूजी को श्रद्धांजलि अर्पित की। कार्यक्रम में सीएम योगी ने कल्याण सिंह के संघर्षों और चुनौतियों की यात्रा को शिखर से शून्य की यात्रा करार दिया। उन्होंने कहा कि कोई व्यक्ति कल्याण सिंह अचानक नहीं बन जाता। कल्याण सिंह बनने के लिए संघर्ष, चुनौती, त्याग और बलिदान का मार्ग चुनना पड़ता है। चुनौती और संघर्ष जब सामने होता है तो त्याग और बलिदान का जज्बा पैदा होता है, तब कोई भी ताकत आपको झुका नहीं सकती, आपका बाल भी बांका नहीं कर सकती है। एक अपार जनआस्था और विश्वास आपके साथ खड़ा होता है। इस अपार जनविश्वास  के प्रतीक कल्याण सिंह जी बने। उन्होंने उस समय की ताकतों का मुकाबला किया, विपरीत परिस्थितियों में काम किया, लेकिन श्रीरामजन्मभूमि आंदोलन के मार्ग से कतई नहीं हटे। अंततः परिणाम आज हमारे सामने है। आज उसकी सुखद अनुभूति पूरी दुनिया में रहने वाले सनातन धर्मावलंबी कर रहे हैं। इस दौरान मुख्यमंत्री ने अपने उद्बोधन में समाजवादी पार्टी और इसके मुखिया पर भी हमला किया और पीडीए पर गंभीर सवाल उठाए।

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जन्म से ही संघर्ष और चुनौतियों से मुकाबला करना सीख लिया  

सीएम योगी ने बाबू जी (कल्याण सिंह) को उनकी तीसरी पुण्ण तिथि पर कोटि-कोटि नमन करते हुए कहा कि अलीगढ़ के एक सामान्य परिवार में जन्म लेने वाले ‘बाबूजी’ ने शुरुआत से ही संघर्ष और चुनौतियों का मुकाबला करना सीख लिया था। पहले किसान और फिर शिक्षक, आरएसएस के स्वयंसेवी, भाजपा कार्यकर्ता के रूप में अपनी यात्रा प्रारंभ करने वाले बाबू जी की यात्रा शून्य से शिखर तक की यात्रा है। वे विधायक भी थे, सांसद भी थे। वह प्रदेश सरकार में कांग्रेस की दमनकारी नीतियों के खिलाफ और आपातकाल के खिलाफ आंदोलन के दौरान जेल में भी बंद हुए थे। आपातकाल के बाद बनी सरकार में वह स्वास्थ्य मंत्री भी थे। राम जन्मभूमि आंदोलन के बाद उमड़ी हुई आस्था में पहली बार भारतीय जनता पार्टी जब प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाती है तो वह मुख्यमंत्री भी बने। 1997 में वह दूसरी बार मुख्यमंत्री बने और फिर हिमांचल और राजस्थान के राज्यपाल के रूप में संवैधानिक पद के दायित्व का कुशलतापूर्वक निर्वहन करते हुए उन्होंने अपनी अंतिम यात्रा पूरी की। रामजन्मभूमि आंदोलन में उनकी भूमिका का ही परिणाम आज हम सबके सामने है। दुनिया में कौन सी श्रमिक और वंचित जातियां होंगी, जिन्होंने अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम अपनी आंखों से नहीं देखा। मानवता का जहां दमन हुआ है, श्रीरामजन्मभूमि पर राम मंदिर का निर्माण उनके लिए आशा की एक किरण है। इस आशा की किरण की शुरुआत तब हुई थी जब ‘बाबूजी’ ने कहा था कि सरकार जाए तो जाने दिया जाए, लेकिन रामभक्तों पर गोली नहीं चलाएंगे।

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बाबू जी ने नहीं किया मूल्यों और आदर्शों के साथ कोई समझौता

सीएम योगी ने कहा कि उनका जीवन भारत की राष्ट्रीयता के प्रति समर्पित था। उन्होंने जातिवाद को प्रश्रय नहीं दिया। समाज का विभाजन करने वाली ताकतों से उन्होंने दूरी बनाए रखी। उन्होंने मूल्यों पर जीवन जिया, राजनीति को आदर्शों को माध्यम बनाया। राजनीति उनके लिए सत्ता और भोग का माध्यम नहीं बनी, राजनीति उनके लिए सौदेबाजी का जरिया नहीं बना, राजनीति उनके लिए अपने स्वार्थों की पूर्ति का माध्यम कभी नहीं बन पाई। वो मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक, सांसद, राज्यपाल किसी भी रूप में रहे हों, लेकिन मूल्यों और आदर्शों के साथ कोई समझौता नहीं किया। आरएसएस की पाठशाला में जो दीक्षा उन्होंने सीखी थी, उसका आजीवन पालन करते रहे। इसलिए वो कल्याण सिंह बन पाए।  

इसलिए कोटि कोटि कार्यकर्ताओं के विश्वास के प्रतीक बन पाए।

हिंदू समाज को बंटने नहीं देना है

श्रीरामजन्मभूमि आंदोलन में कल्याण सिंह के योगदान को याद करते हुए सीएम योगी ने कहा कि याद करिए 30 अक्तूबर 1990 और 2 नवंबर 1990 में अयोध्या में रामभक्तों पर गोलियां चलाई गई थीं और उस समय की सरकार एक तरफ हिंदू समाज को आपस में बांटने का कार्य कर रही थी तो दूसरी तरफ रामभक्तों पर गोलियां बरसा रही थी। तब अडिग चट्टान बनकर उनके सामने टकराने वाला व्यक्तित्व श्रद्धेय ‘बाबूजी’ कल्याण सिंह थे। तब उन्होंने कहा था कि हम हिंदू समाज को बंटने नहीं देंगे। ये जातीयता का जहर घोलने वाले भारत को तोड़ने का काम कर रहे हैं। 30 अक्तूबर और 2 नवंबर 1990 की तिथियां भारत के इतिहास में काले अध्याय के रूप में लिखी जाएंगी, जब अयोध्या में निर्ममतापूर्वक रामभक्तों का लहू बहाया गया था। तब भी श्रद्धेय बाबू जी ने ही आवाज मुखर की थी। 6 दिसंबर 1992 को जब केंद्र सरकार का दबाव था कि अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलाई जाए तब बाबू जी ने कहा था कि केंद्र चाहे तो हमारी सरकार बर्खास्त कर दे, नहीं तो मैं इस्तीफा देने को तैयार हूं, लेकिन रामभक्तों पर हरगिज गोलियां नहीं चलाई जाएंगी। उन्होंने मुख्यमंत्री पद ठुकरा कर संघर्ष का रास्ता चुना।



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