
लखनऊ में 20 को है मतदान
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अपनी नफासत के लिए मशहूर लखनऊ पर चुनावी खुमारी तारी है। हवा के गर्म थपेड़ों से भी ज्यादा गर्मी इन दिनों यहां की सियासी फिजा में है। इसमें मुद्दे भी हैं, सवाल भी हैं, तो नफासत से भरे जवाब भी हैं। आम से लेकर खास तक, जातीय समीकरण से लेकर विकास तक, इन सभी के बूते भाजपा ने इस बार भी तगड़ा चक्रव्यूह रचा है। इसे तोड़ने के लिए विपक्ष को कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी।
लखनऊ के सियासी मिजाज और अंदाज को समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को पलटना होगा। साल था 1991 जब अटल बिहारी वाजपेयी ने यहां की फिजा में भगवा रंग घोला था। 1957 में भारतीय जनसंघ से उतरे वाजपेयी 33.44 फीसदी वोट शेयर हासिल कर भले ही चुनाव हार गए हों, पर भविष्य के लिए मजबूत जमीन तैयार कर दी थी। 1962 में दूसरी बार हारे, पर वोट शेयर बढ़कर 37.47 फीसदी हो गया। 1991 से 2004 तक लगातार पांच बार उन्होंने न केवल जीत दर्ज की, लखनऊ को भगवा गढ़ में तब्दील कर दिया। वाजपेयी की विरासत को लालजी टंडन ने संभाला और वह चुनाव जीते। वर्ष 2014 और 2019 में राजनाथ सिंह यहां से चुनावी रण में उतरे और दोनों ही बार भारी मतों से चुनाव जीते। हैट्रिक लगाने के इरादे से वह फिर चुनाव मैदान मेंे हैं।
माैजूदा रक्षामंत्री और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ का विजय रथ रोकने के लिए सपा ने लखनऊ मध्य के विधायक रविदास मेहरोत्रा को मैदान में उतारा है। वहीं, सरवर मलिक के सहारे बसपा भी सियासी ठौर की तलाश में है।
मतदाताओं की अपनी-अपनी दलीलें
दोपहर का समय है। लखनऊ का मूड भांपने के लिए हम भूतनाथ बाजार पहुंचे। भारी गर्मी के बावजूद एक खोखे पर चाय की चुस्कियों के साथ चुनावी चर्चा का बाजार गर्म था। हम भी इस गरमा-गरम बहस में शामिल हो गए। व्यापारी नेता देवेंद्र गुप्ता बोले, यहां तो साहब राजनाथ सिंह रिकाॅर्ड वोट से जीत रहे हैं। बनारस के बाद यदि भाजपा की कोई सबसे तगड़ी जीत होगी, तो वह लखनऊ में ही होगी। हालांकि जीएसटी स्लैब बदलने जैसे मुद्दे हैं, पर यह चुनाव देश के हर वर्ग के मुद्दों पर हो रहा है।
- मनोज द्विवेदी और राममोहन अग्रवाल ने भी उनकी हां में हां मिलाई। उन्होंने कहा, राजनाथ से बिना समय लिए भी कोई दिल्ली मिलने जाता है, तो भी वह सहजता से मिलते हैं। लवकुश, उत्तम कपूर और मोहित ने भी कहा कि भाजपा यहां एकतरफा जीत रही है।
- अचानक अरशद शफीपूरी बहस में कूद पड़े, देखिए! मुद्दा केवल लखनऊ का नहीं, पूरे देश का है। बेरोजगारी बड़ा मुद्दा है। पांच किलो राशन देकर गरीब को और गरीब बना रहे हैं। मध्य वर्ग तो खत्म ही हो गया है। व्यापार ठप है। ऑनलाइन कारोबार से दुकानदारी खत्म हो गई। सिर्फ हिंदू-मुस्लिम करके ही वोट मांग रहे हैं।
- मो. फुरकान बोले, लोगों को हिंदू-मुस्लिम के नाम पर गुमराह किया जा रहा है। अयाज किदवई बोले, यहां का सब कुछ बिक चुका है या बेचा जा रहा है। पढ़ाई पर 18 प्रतिशत और हीरा खरीद पर तीन प्रतिशत टैक्स है। यानी गरीब तो अब पढ़ ही नहीं सकता है। यहां चुनावी चकल्लस जारी रही और हम आगे बढ़ गए।
नहीं कोई अगर-मगर
अब बारी थी पुराने खांटी लखनऊ की। यहां चौक चौराहे पर पान की गुमटी पर खड़े मिले शिवम दीक्षित बोले, मोदी की सरकार नहीं आए तो समझो माथे का चंदन मिट गया। यह बात हर व्यक्ति जानता है। मोदी सरकार इस बार भी आ रही है। समीर बोले कि अन्य मुद्दे भी तो हैं, यह चंदन की बात कहां से आई? इस पर प्रदीप ने दोहराया कि यहां भाजपा का कोई मुकाबला नहीं। सब एकतरफा चल रहा है।
चर्चा में महिला सुरक्षा, कानून-व्यवस्था
हम लालबाग के भोपाल हाउस हजरतगंज स्थित एक मशहूर चाय की दुकान पर पहुंचे। यहां चाय के साथ चुनावी चर्चा चल रही थी। प्रबुद्ध वर्ग के लोग, व्यापारी, चिकित्सक सभी चुनावी चर्चा में शामिल थे। सोमिल बोले, मोदी का विजन देखकर हम भाजपा को वोट कर रहे हैं। रुचि अग्रवाल बोलीं, लखनऊ में तो कोई कन्फ्यूजन ही नहीं है। यहां राजनाथ रिकाॅर्ड वोटों से जीत रहे हैं। रिया गुप्ता और कंचन अग्रवाल ने भी एक स्वर में कहा, महिला सुरक्षा, कानून-व्यवस्था से लेकर तमाम ऐसे मुद्दे हैं, जिन्हें देखकर भाजपा के अलावा और कोई विकल्प ही नहीं बचता।
मुस्लिम वोटर कर रहे सवाल
चारबाग के निकट एक पेड़ की छांव में चुनावी चर्चा चल रही थी। हमने भी यहां का मिजाज भांपा तो खालिद का कुछ अलग ही दर्द नजर आया। बोले, यहां तो काफी मुस्लिम भी भाजपा को वोट देंगे। समझ ही नहीं रहे हैं कि देश में क्या खेल चल रहा है। राशिद बोले कि क्या खेल? सबकी अपनी समझ है। इस पर अंकित बोले कि भाजपा तो सबकी पार्टी है।
- अहसान ने लंबी सांस खींची और बोले कि लखनऊ में तो हाल यह है कि हम तो भाजपा को वोट न भी करें पर यहां भाजपा मजबूत है। हालांकि मुस्लिम के साथ अन्य ने भी सपा का साथ दे दिया तो भाजपा को मुश्किल हो जाएगी।
