जन्म लेते ही करीब 10 फीसदी बच्चे ऑक्सीजन की कमी से दम तोड़ रहे हैं। जान बच भी जाए तो मानसिक विकार पनप जा रहा है। इसे बर्थ एस्फिक्सिया कहते हैं। ऐसे नवजात के लिए पहला मिनट बेहद महत्वपूर्ण है। इस गोल्डन मिनट में उसे ऑक्सीजन देकर जान बचाई जा सकती है। एसएन मेडिकल कॉलेज में आयोजित कार्यशाला में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के चिकित्सकीय स्टाफ को इसका प्रशिक्षण दिया गया।
बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. पंकज कुमार ने बताया कि 1000 में से 28 शिशु (एक महीने तक के) की मौत ऑक्सीजन की कमी से हो रही है। मानसिक विकार हो जा रहा है। तत्काल अंबू बैग से ऑक्सीजन देकर शिशु की जान बचाई जा सकती है।
पूर्व अध्यक्ष डॉ. नीरज यादव ने बताया कि बर्थ एस्फिक्सिया में जन्म के बाद नवजात के मस्तिष्क और अन्य अंगों तक जरूरी ऑक्सीजन का स्तर कम हो जाता है। इससे सेरेब्रल पाल्सी समेत अन्य मानसिक विकार का खतरा होता है। ऐसे बच्चे सामान्य जीवन नहीं जी पाते। डिप्टी सीएमओ डॉ. सुरेंद्र मोहन प्रजापति ने बताया कि सीएचसी स्टाफ को ऐसे मामलों में प्रशिक्षण दिया गया है। उप प्राचार्य डॉ. टीपी सिंह ने बताया कि गोल्डन मिनट में ऑक्सीजन देने से नवजात की जान का खतरा कम होने के साथ उसके भविष्य की बीमारियों से भी बचाव हो सकता है। संचालन डॉ. राम क्षितिज शर्मा ने किया। कार्यक्रम में डॉ. शिखा गुप्ता, डॉ. अनामिका गोयल, डॉ. मधु नायक, डॉ. नेहा अग्रवाल, डॉ. मेघा अग्रवाल, डॉ. मनीष परमार आदि मौजूद रहे।
ऑक्सीजन की कमी में होती है यह दिक्कत
– जन्म लेने के तत्काल बाद नवजात रोता नहीं है।
– जन्म लेने के बाद नवजात सांस नहीं लेता।
– नवजात की त्वचा का रंग नीला पड़ने लगता है।
– कमजोर मांसपेशियां, हाथ-पैरों की गतिविधि न होना।
इसका दिया प्रशिक्षण
– सीएचसी पर अंबू बैग और ऑक्सीजन की उपलब्धता।
– अंबू बैग से ऑक्सीजन देने के लिए प्रशिक्षित स्टाफ।
– गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच और टीकाकरण।
– नवजात को रुलाने के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया।
