अब बड़े-बुजुर्ग ही नहीं बच्चे भी डायबिटीज का शिकार हो रहे हैं। बीमारी का पता न होने पर तबीयत बिगड़ने पर कई बच्चों को बेहोशी की हालत में भी अस्पताल में भर्ती करना पड़ रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि बच्चों और परिवार में खानपान की आदत, जीवन शैली और कुछ मामलों में आनुवांशिक कारण भी इसके लिए जिम्मेदार है।
बच्चों और बड़ों के मधुमेह में फर्क
बताया गया कि बच्चों और बड़ों के मधुमेह में फर्क होता है। बड़ों में टाइप टू डायबिटीज होती है। जबकि बच्चे टाइप वन डायबिटीज के शिकार हो रहे हैं। जागरूक न होना भी समस्या को बढ़ाता है। कई बच्चों का समय से इलाज शुरू नहीं हो पाता है। इससे न सिर्फ बच्चे की जान जोखिम में पड़ सकती है। बल्कि, उसके मस्तिष्क के क्षतिग्रस्त होने की भी आशंका रहती है।
इंसुलिन की कमी से कई बिमारी
महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. ओमशंकर चौरसिया ने बताया कि टाइप वन डायबिटीज में इंसुलिन बहुत कम या बिल्कुल नहीं बनता है। इस कारण बच्चों को रोजाना इंसुलिन इंजेक्शन की जरूरत पड़ती है। इंसुलिन न होने से कोशिकाएं शुगर की मात्रा को संतुलित नहीं कर पाती हैं। इससे हृदय, आंख, किडनी, नस समेत हर अंग पर असर पड़ता है। तनाव बढ़ने पर बच्चा अन्य बीमारियों का शिकार भी हो जाता है। जरूरी ये है कि लक्षण देखते ही शुगर की जांच कराएं।
केस-1…पांचवी का छात्र को डायबिटीज
दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बना इंसुलिन पांचवीं में पढ़ने वाले एक छात्र बचपन में डायबिटीज का शिकार हो गया। अब इंसुलिन उसकी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। उसके माता-पिता सेहत को लेकर हमेशा चिंतित रहते हैं।
केस-2…आठ साल की बालिका हुई शिकार
मेडिकल कॉलेज की इमरजेंसी में आठ साल की बालिका बेहोशी की हालत में भर्ती हुई। जांच में पता चला कि वह मधुमेह रोगी है। डॉक्टरों ने बताया कि इसे भी जीवनभर इंसुलिन का इंजेक्शन लगाना पड़ेगा।
