अमेठी सिटी। कुपोषण का असर बच्चों के वजन के साथ-साथ उनके संपूर्ण विकास पर पड़ रहा है। इसी का असर है कि जिले के करीब एक तिहाई बच्चों की लंबाई मानक के अनुसार घट गई है। जिले में बाल विकास विभाग की ओर से बच्चों की स्वास्थ्य जांच की गई तो 57,729 बच्चों की लंबाई में औसत से कम वृद्धि पाई गई है, जिसमें से 28,965 बच्चों की लंबाई सामान्य से बहुत कम है।जिले में बाल विकास विभाग की ओर से पांच साल तक के बच्चों के स्वास्थ्य की जांच 1900 आंगनबाड़ी केंद्रों पर की गई। इस दौरान बच्चों की लंबाई के साथ ही उनके वजन की भी माप की गई, जिसमें आए परिणाम चौंकाने वाले हैं। जिला कार्यक्रम अधिकारी संतोष कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि हर उम्र के बच्चों की लंबाई का एक तय मानक है, जिसके आधार पर उनके स्वास्थ्य की जांच की जाती है। आंगनबाड़ी केंद्र के माध्यम से समय-समय पर बच्चों की स्वास्थ्य की जांच का कार्य किया जा रहा है, जिससे उन्हें किसी भी तरह की स्वास्थ्य समस्या न होने पाए।

जिले में 8,283 बच्चे सूखापन से ग्रसित

बाल विकास विभाग की जांच में जिले में 8,283 बच्चे कुपोषित पाए गए हैं, जिसमें मध्यम कुपोषित बच्चों की संख्या 6099 है तो 1284 बच्चे अति कुपोषित की श्रेणी में हैं। इन्हें सूखापन की श्रेणी में रखा गया है।

26281 बच्चे कमजोर

उम्र के अनुसार बच्चों के वजन की माप की गई तो जिले के 26281 बच्चे मानक के अनुसार कम वजन के पाए गए हैं, जिसमें 20125 बच्चे मध्यम रूप से कम वजन के हैं तो 6156 बच्चे बहुत ज्यादा कम वजन के पाए गए हैं।

3617 बच्चे मोटापे से ग्रस्त

बच्चों की लंबाई कम होना, वजन कम होने के साथ ही अत्यधिक वजन भी अस्वास्थ्यकर माना जाता है। जनवरी माह की रिपोर्ट के अनुसार जिले के 3617 बच्चों का वजन जरूरत से ज्यादा है।

कुपोषण के प्रमुख कारण

छोटे बच्चों के कुपोषण के कई प्रमुख कारण हैं। जिला कार्यक्रम अधिकारी संतोष श्रीवास्तव ने बताया कि बच्चों के कुपोषण के कुछ कारण प्रमुख हैं। माता-पिता की जल्दी शादी से बच्चे कुपोषित हो सकते हैं। वहीं समय से पहले बच्चों का जन्म होने व दो बच्चों के जन्म के बीच अंतराल कम होने से भी इस तरह की समस्या होती है। बच्चों की बीमारी और माता-पिता की लापरवाही भी इसके लिए जिम्मेदार है।

बच्चों की अच्छी सेहत के लिए किए जा रहे प्रयास

जिला कार्यक्रम अधिकारी ने बताया कि बच्चों की सेहत में सुधार के लिए बाल विकास विभाग की ओर से उनकी नियमित रूप से स्वास्थ्य जांच की जा रही है। वहीं आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से उन्हें पौष्टिक आहार दिया जा रहा है। इसके साथ ही माता-पिता को पोषण परामर्श आदि दिए जा रहे हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य में सुधार हो सके। अति कुपोषित बच्चों को अस्पताल में भर्ती कर उनके स्वास्थ्य की निगरानी की जा रही है।

गर्भावस्था से ही करें पोषण की शुरुआत

बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए गर्भावस्था से ही पोषण पर ध्यान देने की जरूरत है। गर्भवती महिलाओं के खानपान पर ध्यान देने की जरूरत है। संतुलित आहार नहीं लेने के चलते पैदा होने वाले अधिकांश बच्चे ढाई किलो से कम वजन के जन्म ले रहे हैं। बच्चों के जन्म के बाद हर हाल में छह माह तक मां का दूध ही पिलाएं। छह माह पूरा होते ही बच्चों को दिन में चार बार खाना खिलाना शुरू कर देना चाहिए। बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए दाल, सोयाबीन, पनीर, देशी घी, केला, दलिया, अंडा, हरी सब्जी, गुड़, चना आदि देना चाहिए। यदि बच्चे के दांत नहीं हैं तो दाल-चावल, दलिया, खिचड़ी व मसला हुआ खाना खिला सकते हैं। जिससे बच्चों का स्वास्थ्य बेहतर होगा।

-डॉ. लईक उज जमा, बाल रोग विशेषज्ञ, जिला अस्पताल, अमेठी।



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