इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों में कार्यरत तदर्थ प्रधानाचार्यों के वेतन को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि यदि स्कूल प्रबंधन ने रिक्त पद की सूचना चयन बोर्ड को नहीं दी है तो तदर्थ रूप से पदोन्नत शिक्षक प्रधानाचार्य पद के वेतन का दावा नहीं कर सकता। यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की पीठ ने विभिन्न शिक्षकों की ओर से दायर याचिकाओं पर दिया है।
याची समिता बुलंदशहर स्थित आर्य कन्या इंटर कॉलेज में प्रवक्ता के पद पर तैनात थीं। वरिष्ठता के आधार पर उन्हें तदर्थ प्रधानाचार्य के पद पर नियुुक्त किया गया था। उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर प्रधानाचार्य पद का वेतनमान दिए जाने की गुहार लगाई। कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद कहा कि केवल कार्यभार संभाल लेना ही उच्च वेतन का आधार नहीं हो सकता। इसके लिए यह आवश्यक है कि प्रधानाचार्य का पद दो महीने से अधिक समय तक रिक्त रहा हो और प्रबंधन ने इसकी लिखित सूचना चयन बोर्ड को भेजी हो।
कोर्ट ने संबंधित जिला विद्यालय निरीक्षकों (डीआईओएस) को निर्देशित किया है कि वे प्रत्येक मामले के तथ्यों की बारीकी से जांच करें और यदि अनिवार्य शर्तों के बिना वेतन दिया जा रहा है तो उसे तत्काल प्रभाव से रोक दें। हालांकि, यह भी कहा है कि जो वेतन अब तक दिया जा चुका है, उसकी वसूली शिक्षकों से नहीं की जाएगी। इसके साथ ही अदालत ने उन कॉलेजों को चार सप्ताह का अल्टीमेटम दिया है, जिन्होंने अब तक रिक्तियों की अधिसूचना जारी नहीं की है। साथ ही यह भी याद दिलाया कि उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन नियमावली-2023 के लागू होने के बाद अब तदर्थ नियुक्तियों का कानूनी प्रावधान समाप्त हो चुका है।
