इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्तियों के बंटवारे से जुड़े मामले को बिना ट्रायल शुरुआती चरण में ही बेनामी से जुड़ा बताकर खारिज करना न्यायसंगत नहीं है। यह तय करना कि संपत्ति वाकई बेनामी है या परिवार की संयुक्त पूंजी से बनी है, इसकी परख ट्रायल के दौरान साक्ष्यों से होगी, न कि प्रारंभिक धारणा से।
इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकल पीठ ने गोरखपुर निवासी ओम प्रकाश गुप्ता और उनके भाई राधेश्याम के बीच उपजे विवाद पर जिला अदालत के फैसले को रद्द कर दिया। साथ ही खारिज हो चुके मूलवाद को बहाल करते हुए जिला अदालत को बिना अनावश्यक स्थगन देते हुए एक साल में नए सिरे से फैसला लेना का आदेश दिया है। यही नहीं, मूलवाद लंबित रहने के दौरान संपत्ति में किसी तीसरे पक्षकार के किसी भी तरह के अधिकार व हस्तक्षेप पर रोक भी लगा दी है।
मामला दो सगे भाइयों के बीच संपत्ति विवाद से जुड़ा है। वादी (ओम प्रकाश) का दावा है कि उसने और उसके बड़े भाई (राधेश्याम) ने वर्षों तक मिलकर कारोबार किया। उससे संयुक्त बैंक खाते में आने वाली आय से परिवार के सदस्यों के नाम संपत्तियां खरीदीं। सामाजिक और व्यक्तिगत कारणों से ये संपत्तियां अलग-अलग नाम पर थीं। हालांकि, निचली अदालत ने इसे बेनामी लेनदेन करार देते हुए आदेश 7 नियम 11 सीपीसी के तहत मुकदमे को सुनने से ही इन्कार कर दिया। इसके खिलाफ याची ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने याची की अपील स्वीकार कर ली।
क्या है सीपीसी का आदेश 7 नियम 11
दीवानी प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) का आदेश 7 नियम 11 अदालत को वह शक्ति देता है, जिसके तहत वह किसी मुकदमे को शुरुआती स्तर पर ही खारिज कर सकती है। यदि वादपत्र में कानूनी आधार की कमी हो, कोर्ट फीस न भरी गई हो या कानूनन उस मुकदमे पर रोक हो तो बिना गवाही या सबूत के केस बंद कर दिया जाता है। यह अदालती समय बचाने का एक फिल्टर है।
भाइयों का विवाद सिर्फ कागज का टुकड़ा नहीं है। इसमें संयुक्त परिवार के गहरे तथ्य छिपे हैं, जिन्हें बिना ट्रायल के नहीं सुलझाया जा सकता। – इलाहाबाद हाईकोर्ट
