हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक महिला के अनुकंपा नियुक्ति के मामले में दिए अहम फैसले में कहा कि सिर्फ आर्य समाज मंदिर का प्रमाणपत्र विवाह का वैध सबूत नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि महज स्टांप पेपर पर पति – पत्नी के बीच तलाक नहीं हो सकता है। इन टिप्पणियों के साथ कोर्ट ने महिला की अनुकंपा नियुक्ति पाने की याचिका खारिज कर दी।

Trending Videos

न्यायमूर्ति मनीष माथुर की एकल पीठ ने यह फैसला महिला की याचिका पर दिया। महिला ने अपने कथित पति की मृत्यु के बाद उसकी जगह खुद को अनुकंपा नियुक्ति प्रदान करने का दावा किया था, जिसे कृषि विभाग ने बीते 5 अप्रैल को खारिज कर दिया था। दावे को खारिज करने के इसी आदेश को महिला ने याचिका में चुनौती दी थी। महिला का कहना था की उसने कृषि विभाग में कार्यरत व्यक्ति के साथ, उसकी पहली पत्नी से कथित तलाक होने के बाद वर्ष 2021 में आर्य समाज मंदिर में विवाह किया था। इसके लिए महिला ने सिर्फ आर्य समाज मंदिर से जारी विवाह का प्रमाणपत्र पेश किया। इसके अलावा वह सेवारत व्यक्ति का पहली पत्नी के साथ तलाक होने की कोई कानूनी डिक्री (फैसला) पेश नहीं कर सकी।

हाईकोर्ट ने कहा कि महिला के कथित पति का पहली पत्नी के साथ तलाक का दावा सिर्फ एक स्टांप पेपर पर आधारित है, जिसमें दोनों के बीच तलाक होने की बात कही गई है। ऐसे किसी स्टांप पेपर को रिकार्ड पर पेश भी नहीं किया गया। जबकि, विवाहित जोड़े के बीच तलाक सिर्फ हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के प्रावधानों के तहत ही प्रभावी हो सकती है। ऐसे में तलाक को साबित करने के लिए अदालत का आदेश जरूरी है। लिहाजा, याची का यह दावा करना कि वही सिर्फ मृतक की जीवित पत्नी है, कानून की नजर में ठहरने योग्य नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि याची महिला का नाम न तो मृतक की सर्विस बुक में दर्ज है और न ही कार्यालय के किसी दस्तावेज में बतौर नामिनी दर्ज है।

कोर्ट ने दो अन्य मामलों में दिए गए फैसलों का हवाला देकर कहा कि सिर्फ आर्य समाज मंदिर से जारी प्रमाणपत्र को विधिक विवाह का ठोस सबूत नहीं माना जा सकता है। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने याची महिला को राहत न देकर याचिका खारिज कर दी।



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *