लखनऊ। श्रीलंका के आनंद हों या फिर कलणि विहंगा। या फिर तजाकिस्तान की रहने वाली खनीफा और उनके ढेर सारे दोस्त। सभी ने कॅरिअर की नींव रखने के लिए हिंदी को चुना है। उन्हें लगता है कि उनका अपना देश हो या फिर दुनिया का कोई और कोना, उन्हें कॅरिअर में आगे बढ़ाने में हिंदी बहुत मदद करेगी।
इसे हिंदी के प्रति उनकी आस्था कहें या फिर इस भाषा में छिपी संभावनाएं, जिसने उन्हें इस कदर आत्मविश्वास से भर दिया कि उन्होंने लखनऊ तक का सफर तय किया। वो भी सिर्फ हिंदी पढ़ने के लिए। जो किसी अन्य विधा में पढ़ाई करने आए, उन्होंने भी यहां आकर या यहां आने से पहले हिंदी सीखने के लिए खुद को समर्पित कर दिया। लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले विदेशी छात्र-छात्राओं ने हिंदी दिवस पर अमर उजाला कार्यालय में अपने अनुभव साझा किए। लखनऊ शहर की खूबियां भी गिनाईं।उन्होंने कुछ चीजों में सुधार के सुझाव भी दिए।
साझा किए अनुभव
गाने सुनकर हिंदी को जाना, अब तो यही सब कुछ
श्रीलंका से आईं कलणि विहंगा कहती हैं कि वे अपने देश में पढ़ा रही थीं। विशेषज्ञता हासिल करने के लिए आगे की पढ़ाई का फैसला किया है। बाॅलीवुड गानों को सुनकर हिंदी को जाना। बोलीं, अब यह हमारे कॅरिअर का जरिया है। श्रीलंका की ही मयूरी कहती हैं कि उन्होंने तो शास्त्रीय संगीत सीखना शुरू किया था। कब हिंदी उनके कॅरिअर का हिस्सा हो गई, मालूम नहीं चला।
डेढ़ सौ और ढाई सौ रुपये में रहता भ्रम
श्रीलंका की दिनिथी ने हंसते हुए बताया कि जब वे लखनऊ आईं तो यहां बाजार में डेढ़ सौ और ढाई सौ रुपये में अंतर समझ नहीं पाती थीं। कोई डेढ़ सौ रुपये बताता तो हम 250 रुपये में देने के लिए बोलते। यहां के दुकानदारों की ईमानदारी है कि वे हमें समझाते कि आप उलटा बोल रही हैं। डेढ़ सौ कम होते हैं, ढाई सौ ज्यादा। अन्य विषय की पढ़ाई कर रहीं फिजी की रोमिना ने कहा कि रोजमर्रा में बोलते-बोलते हम लोग भी हिंदी सीख रहे हैं।
लखनऊ में खूबियां बहुत हैं, पर कुछ खटकता भी है
विदेशी छात्र-छात्राओं को लखनऊ बहुत भाया है। मगर कुछ ऐसा भी है, जो उन्हें खटकता है। एक छात्रा का कहना है कि दुष्कर्म जैसी खबरें लखनऊ में भी डराती हैं। चलते-चलते छेड़खानी जैसा भी होता है। लोग बिना वजह घूरते हैं। यह अच्छा नहीं लगता। एक अन्य छात्रा ने कहा कि कुछ स्थानों पर तो बहुत सफाई है, लेकिन कहीं-कहीं गंदगी अखरती है। जगह-जगह पान मसाला खाकर उसका रैपर फेंक देना, कहीं पर भी थूक देना, यह सबकुछ शहर को गंदा बनाता है। यहां साफ-सफाई पर और ध्यान देने की जरूरत है। सभी ने इस बात का समर्थन किया कि लखनऊ सभी को अपना लेता है। सुरक्षा के लिहाज से यह शहर बहुत अच्छा है।
इनकी रही सहभागिता
– म्या प्विंट फ्यू- म्यांमार : बीकॉम करने के लिए दो महीना पहले ही लखनऊ आईं हैं।
– शिवाली बिस्वा-फिजी : मनोविज्ञान में एमए करने के लिए एक महीना पहले ही लखनऊ आईं।
– पूर्णिमा दिन-फिजी : फिजी से लखनऊ आए छह हफ्ते हुए। यहां अंग्रेजी में पीएचडी की पढ़ाई शुरू की है।
– मोहम्मद साबित- तजाकिस्तान : हिंदी में एमए कर रहे हैं। छह महीने पहले लविवि में दाखिला लिया।
– खनीफा-तजाकिस्तान : हिंदी में एमए करने लखनऊ आई हैं। छह महीने से यहां हैं।
-अली रेजा-अफगानिस्तान : लखनऊ विवि से पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की पढ़ाई कर रहे हैं। यहां चार साल से हैं।
-शेकिब लॉदिन-अफगानिस्तान : अर्थशास्त्र में पीएचडी कर रहे हैं। बीए और एमए यहीं से किया। पांच साल से लखनऊ में हैं।
– आनंद अबेसुंदर-श्रीलंका : हिंदी में पीएचडी करने श्रीलंका से लखनऊ आए। यहां एक साल से हैं।
-मयूरी अनुराधा-श्रीलंका : लखनऊ आने का मकसद हिंदी में एमए करना। यहां आए एक साल हो गया।
– कांचना डी अल्विस-श्रीलंका : हिंदी की शोध छात्रा हैं। एक साल पहले लखनऊ आईं।
– दिनिथी दुष्मांथा-श्रीलंका : शिक्षा शास्त्र में मास्टर की डिग्री लेने के लिए एक साल पहले लखनऊ आईं थीं।
-कलणि विहंगा-श्रीलंका : हिंदी में स्नातकोत्तर कर रही हैं। एक साल पहले लखनऊ आईं।
-रोमिना सिंघ-फिजी : लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में पीएचडी करने के लिए लखनऊ आईं।
– ऐ थू थू आंग : अंग्रेजी साहित्य में पीएचडी कर रही हैं। म्यांमार से 2021 में लखनऊ आई थीं।
