फाल्गुन की आहट के साथ जिन जंगलों में कभी अंगारों-सी लालिमा लहराती थी, वहां इस बार सन्नाटा पसरा है। बदायूं के कादरचौक क्षेत्र के सैकड़ों एकड़ में फैले पलाश वन में होली तक टेसू के फूल नहीं खिले। बसंत का शृंगार कहे जाने वाले इन फूलों के बिना जंगल वीरान नजर आ रहे हैं। ग्रामीणों और बुजुर्गों का कहना है कि लंबे समय बाद फाल्गुन का ऐसा सूना दृश्य देखा है। ऐसे में इन फूलों के सहारे हर साल होने वाला लाखों रुपये का कारोबार भी इस बार नहीं हो सकेगा। जो लोग सूखे फूल रखे हैं उसी से रंग बनाने की तैयारी की जा रही है।

जानकारों के मुताबिक पलाश को टेसू, ढाक, परसा, केसू और किंशुक जैसे नामों से जाना जाता है। बसंत ऋतु में इसके पुष्प गुच्छ अंगारों की तरह दहकते थे और गिरे फूलों से धरती लाल चादर-सी ओढ़ लेती थी। अंग्रेजी साहित्य में इसे ‘फ्लेम ऑफ फॉरेस्ट’ यानी ‘वन ज्योति’ कहा गया है। लेकिन इस बार बसंत का यह शृंगार गायब है।

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जलवायु परिवर्तन और अतिक्रमण का असर

स्थानीय लोगों का मानना है कि प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और वन क्षेत्र पर बढ़ते कब्जों ने पलाश के प्राकृतिक चक्र को प्रभावित किया है। ककोड़ा, कादरचौक और भूड़ा-भदरौल में लगभग 150 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैले पलाश वन का दायरा लगातार सिमट रहा है। कभी एक हजार एकड़ तक फैले वन अब सीमित परिक्षेत्र में रह गए हैं। नई पौध तैयार नहीं हो पा रही और पुराने वृक्ष धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं। वन विभाग की उदासीनता पर भी सवाल उठ रहे हैं। क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि अवैध कटान और जलौनी लकड़ी की निकासी पर प्रभावी रोक नहीं लग पा रही।

होली के रंग और परंपरा से जुड़ा है टेसू

चार-पांच दशक पहले तक होली के प्राकृतिक रंग इन्हीं फूलों से तैयार किए जाते थे। आज भी कुछ लोग त्वचा के लिए लाभकारी टेसू के फूलों से रंग बनाकर होली खेलते हैं। प्राचीन ग्रंथों और लोकसाहित्य में पलाश का उल्लेख मिलता है। सामाजिक और सांस्कृतिक सरोकारों में इसका विशेष स्थान रहा है।



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