तकनीक के तेजी से बढ़ते दौर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) जहां लोगों के काम को आसान बना रहा है, वहीं इसका दुरुपयोग भी नई चुनौतियां पैदा कर रहा है। अपराधी अब एआई की मदद से अपराध के नए तरीके अपना रहे हैं और अपनी पहचान छिपाने के उपाय भी खोज रहे हैं। ऐसे में जांच एजेंसियों के सामने अपराधियों तक पहुंचना पहले की तुलना में ज्यादा कठिन हो गया है। इस चुनौती से निपटने में फॉरेंसिक विज्ञान अहम भूमिका निभा रहा है।

बुंदेलखंड विश्वविद्यालय (बीयू) के गांधी ऑडिटोरियम में शनिवार को ‘आधुनिक अपराध जांच में फॉरेंसिक विज्ञान के बदलते आयाम’ विषय पर शुरू हुई दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में देशभर से आए विशेषज्ञों ने अपनी राय जाहिर करते हुए ये बातें कहीं। संगोष्ठी का आयोजन विश्वविद्यालय के डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेंसिक साइंस एंड क्रिमिनोलॉजी की ओर से किया गया।

बदल रहा अपराध का स्वरूप

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. मुकेश पांडेय ने कहा कि वर्तमान समय में अपराध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। तकनीक और डिजिटल माध्यमों के विस्तार के कारण अपराध अधिक जटिल हो गए हैं। ऐसे में अपराधों की वैज्ञानिक जांच के लिए फॉरेंसिक विज्ञान की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है।

एआई टूल की मदद से असली और फर्जी अभ्यर्थी की पहचान आसान

एफएसएल जयपुर के निदेशक डॉ. अजय शर्मा ने कहा कि एआई आज के समय में मददगार भी है और घातक भी। एक ओर यह जांच एजेंसियों को अपराध सुलझाने में सहायता देता है, वहीं दूसरी ओर अपराधी भी इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि राजस्थान में एसआई भर्ती परीक्षा में कुछ आरोपियों ने एआई से तैयार किए गए फोटो का इस्तेमाल किया था, जिससे असली और फर्जी अभ्यर्थी की पहचान करना मुश्किल हो गया था। हालांकि बाद में एआई टूल की मदद से ही पूरे मामले का खुलासा किया गया।



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