स्वच्छ सर्वेक्षण के तहत शहर में स्लोगन और पेंटिंग के काम में बड़े स्तर पर गड़बड़ी सामने आई है। विभागीय कर्मियों की मिलीभगत से एक करोड़ रुपये से अधिक का बिल लगाया गया, जबकि जांच में करीब 30 लाख रुपये का ही काम पाया गया। नगर आयुक्त के निर्देश पर दोबारा माप कराई गई, जिसके बाद कटौती करते हुए लगभग 28 लाख रुपये का ही भुगतान किया गया।
नगर निगम हर साल स्वच्छ सर्वेक्षण के तहत शहर के प्रमुख स्थानों पर दीवारों की मरम्मत, घिसाई, सफेद पुट्टी और पेंटिंग का काम कराता है। इसके अलावा सामुदायिक शौचालयों की रंगाई-पुताई के साथ स्वच्छता संबंधी स्लोगन भी लिखे जाते हैं। स्वच्छ सर्वेक्षण-2024 के लिए टीम के आने से पहले दिसंबर 2024 में दर अनुबंध के आधार पर एक फर्म को यह काम दिया गया था। इसके लिए नगर निगम ने तीन वर्कऑर्डर जारी किए थे।
फर्म ने जनवरी से अप्रैल 2025 के बीच काम पूरा करने का दावा करते हुए भुगतान के लिए बिल तैयार कराया। इस बिल में एक करोड़ रुपये से अधिक का कार्य दिखाया गया। भुगतान की इतनी बड़ी राशि देखकर नगर निगम अधिकारियों को संदेह हुआ और नगर आयुक्त ने कार्यों की दोबारा जांच कराने के निर्देश दिए।
28 लाख रुपये का ही भुगतान
जांच के दौरान तीनों वर्क ऑर्डरों की अलग-अलग जेई से माप कराई गई। इसमें सामने आया कि शहर में करीब 30 लाख रुपये का ही काम हुआ है, जबकि बिल में एक करोड़ रुपये से अधिक का बिल दर्शाया गया था। इससे विभागीय स्तर पर बड़े खेल की आशंका जताई जा रही है। कई महीनों से चल रही जांच और प्रक्रिया के बाद हाल ही में कटौती करते हुए लगभग 28 लाख रुपये का ही भुगतान फर्म को किया गया।
वर्कऑर्डर की सीमा से ज्यादा दिखाया गया काम
सूत्रों के अनुसार प्रत्येक वर्कऑर्डर पर 10 लाख रुपये तक के कार्यों का भुगतान ही नगर आयुक्त स्तर से किया जा सकता है। इसके बावजूद एक-एक वर्कऑर्डर में इससे कहीं अधिक काम दर्शाया गया था, जिससे पूरे मामले पर सवाल खड़े हो गए।
इनका यह है कहना
स्वच्छ सर्वेक्षण के तहत हुए कार्यों का एक करोड़ रुपये से अधिक का बिल प्रस्तुत किया गया था। जांच कराने पर करीब 30 लाख रुपये का ही काम पाया गया। इसके बाद लगभग 28 लाख रुपये का भुगतान फर्म को किया गया है।- आकांक्षा राणा, नगर आयुक्त
