जिला कारागार में कई बंदी ऐसे भी हैं जो जेल की चहारदीवारी के भीतर रहकर मशक्कत करके परिवार का अभी भी खर्चा उठा रहे हैं। ये बंदी हर महीने न्यूनतम 5-6 हजार रुपये तक परिवार को देते हैं, जिससे उनका जीवन बसर होता है। वहीं, कई बंदी पारिश्रमिक से मिले पैसों को अपना मुकदमा लड़ने में खर्च करते हैं।
बंदियों को उनके काम करने के एवज में जेल प्रशासन पारिश्रमिक देता है। कुछ साल पहले यह बहुत कम था लेकिन दो साल पहले इसमें इजाफा हुआ। अब अकुशल श्रेणी के बंदी को 40 रुपये प्रतिदिन, अर्द्ध कुशल को 60 एवं काम में कुशल बंदी को 81 रुपये दिए जाते हैं। झांसी जेल में कुशल बंदियों को भोजनालय, खेती-किसानी, फर्नीचर निर्माण जैसे काम में लगाया जाता है। इससे कई बंदियों को दस हजार रुपये तक मिलता है। अधिकांश बंदी यह पैसा अपने घर भेजते हैं। इनमें से कई बंदियों के घर में कमाई का कोई दूसरा रास्ता नहीं है।
थाना उल्दन के निमोनी गांव निवासी रवि जेल में रहकर 13,950 रुपये पारिश्रमिक से जुटा चुका है। इस पैसे को वह अपने घर भेज देता है। थाना समथर के खूजा गांव निवासी मानवेंद्र के घर में दादी जमुना देवी अकेली रहती हैं। मानवेंद्र भी जेल के भीतर कुशल कामगार है। काम करके वह करीब 4600-5000 रुपये महीने तक कमा लेता है। इस रकम को वह अपनी दादी के पास भेज देता है।
चिरगांव के बजेरा निवासी ओमप्रकाश को हर महीने करीब 6000 रुपये तक मिलते हैं। यह पैसा वह अपने दोस्त यूमिश खान को भेज देता है। वह इस रकम से उसकी पैरवी कर रहा है। कई बंदी ऐसे भी हैं जो पारिश्रमिक में मिली रकम को खर्च न करके जमा करते हैं। जेल से बाहर निकलने पर उनके हाथ मोटी रकम आ जाती है।
लहचुरा थाना के शेहपुरा गांव निवासी कोमल ने काम करके कुल 27 हजार रुपये जमा कर लिए थे। जेल से छूटने के बाद यह रकम लेकर वह अपने साथ गया। इसी तरह समथर के लोहागढ़ निवासी पवन ने भी जेल के भीतर काम करके 12400 रुपये जुटा लिए। वरिष्ठ जेल अधीक्षक विनोद कुमार का कहना है कि बंदियों को उनकी क्षमता के मुताबिक काम दिया जाता है। तय पारिश्रमिक भी मिलता है। कई बंदी इसे अपने परिवार को भेजते हैं।
