राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने दो बार झांसी आकर देश की आजादी के आंदोलन को धार दी थी। उन्होंने झांसी के किले में जनसभा को संबोधित करते हुए कहा था कि रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान भारत की आत्मा में बसता है। एसपीआई इंटर कॉलेज में जिस कक्ष में वह ठहरे थे, उसका नाम महात्मा गांधी स्मृति कक्ष रखा गया है। इसके अलावा कॉलेज परिसर में उनकी प्रतिमा भी स्थापित करवाई गई है।

रानी लक्ष्मीबाई को दी थी श्रद्धांजलि

झांसी केवल 1857 की क्रांति की भूमि नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में भी राष्ट्रीय चेतना का प्रमुख केंद्र रही। महात्मा गांधी सबसे पहले वर्ष 1921 के नवंबर महीने में झांसी आए थे। इतिहासकार हरगोविंद कुशवाहा का कहना है कि झांसी गजेटियर के पेज 71 पर इसका उल्लेख किया गया है। उस समय देश में आजादी का आंदोलन चरम पर था। महात्मा गांधी ने झांसी आगमन पर हार्डीगंज (अब सुभाषगंज), किले के आसपास समेत कई स्थलों पर विदेशी कपड़ों की होली जलवाई थी। उन्होंने जन-जन में आजादी की अलख जगाते हुए कहा था कि जब तक देश आजाद नहीं हो जाता, तब तक संघर्ष जारी रहेगा। आजादी के आंदोलन में हर व्यक्ति को अपनी भूमिका अदा करनी है। इस दौरान उन्होंने झांसी किले में रानी लक्ष्मीबाई को श्रद्धांजलि अर्पित की थी। स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को नमन किया। इस यात्रा ने झांसी को 1857 की क्रांति और 1921 के स्वतंत्रता आंदोलन के बीच वैचारिक सेतु प्रदान किया।

लोगों ने चंदा एकत्र कर भेंट की थी थैली

हरगोविंद कुशवाहा का कहना है कि दूसरी बार महात्मा गांधी वर्ष 1929 में 22 नवंबर को झांसी आए थे। एक दिन यहां ठहरने के बाद वह मुंशी अजमेरी के आमंत्रण पर 23 नवंबर को चिरगांव पहुंचे। यहां पर उन्होंने राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के निवास पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की बैठक को संबोधित किया। इसके बाद मुख्य बाजार में सभा को संबोधित किया। उस दाैरान उन्होंने संदेश दिया कि आजादी केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक परिवर्तन का मार्ग है। यहां से जाते समय महात्मा गांधी कुछ देर मोंठ में भी रुके थे। यहां के लोगों ने भी उन्हें चंदा एकत्र कर थैली भेंट की थी। इस यात्रा ने झांसी में राष्ट्रीय आंदोलन को और अधिक संगठित किया।इससे आंदोलन में महिलाओं और युवाओं की सक्रिय भागीदारी को बढ़ावा मिला। स्वतंत्रता संग्राम को जन आंदोलन का स्वरूप मिला।



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