राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की प्रधान पीठ ने धसान नदी में रेत खनन के लिए जारी पर्यावरणीय स्वीकृति (ईसी) निरस्त किए जाने के खिलाफ दाखिल याचिका खारिज कर दी। देरी से याचिका दाखिल करने और अदालत का समय खराब करने की वजह से एनजीटी ने याची पर 25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। इस फैसले से धसान नदी में रेत खनन के लिए जारी पट्टों के निरस्त होने की आशंकापैदा हो गई है।
झांसी के मऊरानीपुर, गरौठा समेत अन्य क्षेत्रों से बहने वाली धसान नदी में रेत खनन के लिए 18 नवंबर 2022 को पर्यावरण मंजूरी दी गई थी लेकिन कुछ समय बाद राज्यस्तरीय पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन प्राधिकरण (एसआईएए) ने इस मंजूरी को निरस्त कर दिया था। एसआईएए की ओर से तर्क दिया गया कि रेत उत्खनन के दौरान कई गंभीर अनियमितताएं की जा रही हैं। इससे पर्यावरण को गंभीर खतरा पैदा हो गया है। प्राधिकरण के पर्यावरणीय मंजूरी निरस्त करने से खनिज विभाग की ओर से जारी पट्टों पर खतरा पैदा हो गया हालांकि अंतरिम राहत मिलने की उम्मीद से गरौठा के मोती कटरा समेत कई इलाकों में घाट से बालू निकासी का काम जारी रहा।उधर, 15 मई, 2025 को मंजूरी निरस्त किए जाने के खिलाफ एनजीटी में याचिका दाखिल की गई। याची ने यह कहते हुए अपना पक्ष रखा कि बिना किसी उचित तर्क के यह पर्यावरणीय मंजूरी निरस्त की गई जबकि व्यापक अध्ययन के बाद यह मंजूरी जारी हुई थी।
इस मामले की सुनवाई करते हुए 24 दिसंबर को न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव एवं विशेषज्ञ सदस्य ए. सेंथिल वेल की पीठ ने पाया कि एनजीटी अधिनियम 2010 की धारा 16 के तहत अपील समय से दाखिल नहीं हुई। पीठ का कहना था कि 90 दिनों से अधिक देरी को माफ करने का अधिकार उनके पास नहीं है। यह अपील 178 दिनों के बाद दायर हुई थी। अपीलकर्ता ने यह भी दलील दी कि पर्यावरण मंजूरी रद्द किए जाने के आदेश की जानकारी उनको नहीं हो सकी थी। न्यायाधिकरण ने इसे भी मानने से इन्कार करते हुए बताया कि सभी पक्षों को ईमेल, सार्वजनिक पोर्टल एवं पंजीकृत डाक से यह आदेश भेजा गया था।
