बुंदेलखंड में मगरमच्छों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। बुंदेलखंड क्षेत्र में बहने वाली बेतवा नदी का पानी इनके लिए अनुकूल साबित हो रहा है। वन विभाग के मुताबिक बेहतर संरक्षण और प्राकृतिक आवास की सुरक्षा के चलते बीते पांच वर्षों में इनकी संख्या करीब दोगुनी हो गई है।

मगरमच्छों के पारिस्थितिक तंत्र पर अध्ययन करने वाले विशेषज्ञ डॉ. गिरीश मिश्रा के अनुसार, कोरोनाकाल से पहले बेतवा नदी के बहाव क्षेत्र में करीब 2700 मगरमच्छों का अनुमान था। अवैध शिकार पर सख्ती, रेत खनन पर निगरानी और घोंसलों की सुरक्षा जैसे उपायों से इनके प्राकृतिक प्रजनन में बढ़ोतरी हुई है। वर्तमान में इनकी संख्या बढ़कर लगभग 5500 से अधिक हो गई है। संख्या बढ़ने के साथ अब ये मगरमच्छ अक्सर नदी किनारे धूप सेंकते दिखाई देते हैं। बबीना, माताटीला बांध और ओरछा समेत आसपास के इलाकों में रोजाना मगरमच्छों को धूप में आराम करते देखा जा सकता है।

वन विशेषज्ञों का मानना है कि मगरमच्छों की बढ़ती संख्या नदी के संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत है। डीएफओ नीरज आर्य के अनुसार सुरक्षित वातावरण और संरक्षण उपायों के चलते इनकी आबादी में लगातार वृद्धि हो रही है। इससे क्षेत्र में इको टूरिज्म को भी बढ़ावा मिल सकता है।

चंबल में भी बढ़ रही घड़ियालों की संख्या

घड़ियाल दुनिया की अत्यंत संकटग्रस्त प्रजातियों में गिने जाते हैं। इनके संरक्षण के लिए चंबल नदी में राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य की स्थापना की गई। यह अभयारण्य बुंदेलखंड के उत्तर प्रदेश के जालौन के साथ-साथ मध्य प्रदेश के मुरैना और भिंड जिलों तक फैला है। वन अधिकारियों के अनुसार 1970 के दशक में घड़ियालों की संख्या 200 से भी कम रह गई थी, लेकिन संरक्षण प्रयासों के बाद अब इनकी संख्या बढ़कर 2000 से अधिक हो चुकी है। सबसे अधिक घड़ियाल चंबल नदी में पाए जाते हैं। पतले और लंबे थूथन के कारण घड़ियाल मनुष्यों को नुकसान नहीं पहुंचाते, इसलिए इन्हें हमलावर प्रजाति में शामिल नहीं किया जाता। हालांकि, आक्रामक न होने की वजह से ये शिकारियों के लिए आसान निशाना बन जाते हैं।



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