बुंदेलखंड के इतिहास, संस्कृति और वीर परंपरा को अपने लेखन में जीवंत करने वाले वृंदावन लाल वर्मा हिंदी के उन विरले साहित्यकारों में गिने जाते हैं, जिन्होंने ऐतिहासिक घटनाओं को जनमानस से जोड़ा। आज से 37 साल पहले उनकी जन्मशती पर दिल्ली में वर्ष 1989 के सितंबर महीने में आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में देश के प्रमुख साहित्यकारों ने उनकी कृतियों पर प्रकाश डाला था। ‘इतिहास रस’ नामक उस संगोष्ठी को अमर उजाला ने प्रमुखता से स्थान दिया था।

झांसी जिले के मऊरानीपुर तहसील के गांव धबाकर में 9 जनवरी 1889 को जन्मे महान उपन्यासकार वृंदावन लाल वर्मा के बारे में साहित्यकारों और शोधकर्ताओं का कहना है कि उनकी रचनाएं आज भी बुंदेलखंड की पहचान और हिंदी साहित्य की धरोहर बनी हुई हैं। संगोष्ठी राष्ट्रीय में सुप्रसिद्ध कवि नागर्जुन ने कहा था कि आंचलिक लेखन को ताकत पहुंचाने की आवश्यकता है। वृंदावन लाल वर्मा ने इसकी बखूबी पूर्ति की। उन्होंने तब कहा था कि इसके लिए क्षेत्र की कथा लिखी जाए और उस क्षेत्र के इतिहास और भूगोल की गहराई में जाना चाहिए। वह युगपुरुष थे। उसी संगोष्ठी में साहित्यकार अमृतलाल नागर और विष्णु प्रभाकर ने कहा कि वर्मा जी का व्यक्तित्व बहुमुखी के साथ-साथ बहिर्मुखी भी था। ठाकुर प्रसाद सिंह ने कहा था कि वृदालाल वर्मा की कृति जिन प्रारंभिक उपन्यासों पर टिकी है वे बुंदेलखंड की पृष्ठभूमि पर ही लिखे गए हैं। उनकी रचनाओं में बुंदेलखंड कहीं खंडित नहीं है। उसमें पूरे देश का चित्र है। उनके पात्र केवल बुंदेलखंड के नहीं, बल्कि पूरे देश और इतिहास और प्रत्यक्ष वर्तमान के प्रतिनिधि हैं। कृष्ण दत्त वाजपेयी ने कहा कि वर्मा जी ने अपने कथा साहित्य में वीरों को पैदा करने वाली बुंदेलखंड की धरती की प्राकृतिक मनोहरता और वहां के जनजीवन की शालीनता को अमर बना दिया है।

उनकी प्रमुख कृतियां

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, मृगनयनी, गढ़कुंडार, अहिल्याबाई, विराटा की पद्मिनी आदि।

उनके लिखे प्रमुख नाटक

बांस की फांस, मंगलसूत्र, पीले हाथ, हंस मयूर, पूर्व की ओर आदि।

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई उपन्यास पर बनी थी फिल्म

ऐतिहासिक उपन्यास ‘झांसी की रानी लक्ष्मीबाई’ पर प्रख्यात फिल्मकार और अभिनेता सोहराब मोदी ने चर्चित ऐतिहासिक फिल्म का निर्माण किया था। यह फिल्म वर्ष 1953 में प्रदर्शित हुई, जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की वीर नायिका रानी लक्ष्मीबाई के शौर्य, बलिदान और स्वाभिमान को बड़े परदे पर प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। इस फिल्म ने न केवल रानी लक्ष्मीबाई के जीवन को जन-जन तक पहुंचाया, बल्कि ऐतिहासिक विषयों पर सशक्त सिनेमा की परंपरा को भी मजबूती दी।

 



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